कोई अ-मुद्दा कैसे मुद्दा बनता है, इसका ताजा उदाहरण है, दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला! समलैंगिकता पर दिया गया फैसला! स्वयं यह फैसला और इस फैसले में उछाला गया मुद्दा क्या सचमुच कोई मुद्दा है?
भारतीय समाज में समलैंगिकता ज्वलंत मुद्दा कब रहा है? न उस समय जब 1861 में लार्ड मैकाले ने यह कानून भारत पर थोपा था, न प्राचीन काल में और न ही आज! अपवादस्वरूप तो वह मनु और वात्स्यायन के काल में भी था। लेकिन जी हां, यह ब्रिटिश समाज और यूरोपीय समाज का गहरा सिरदर्द जरूर था। उसी औपनिवेशक सिरदर्द को मैकाले ने भारत पर थोप दिया।
साम्राज्यवादी शासन के कारिंदे जब दूर देशों को गुलाम बनाने जाते थे तो अपने साथ अपने बीवी-बच्चों को नहीं ले जाते थे। खास तौर से १८५७ के खून-खराबे के बाद! फौजियों की तरह वे अनजान और सुनसान प्रदेशों में कुंठाग्रस्त जीवन बिताते थे।
वे स्थानीय औरतों से संपर्क जरूर करते थे, लेकिन उन्हें हमेशा रंगे हाथ पकड़े जाने का डर रहता था, क्योंकि संतान से बड़ा प्रमाण क्या हो सकता था। इसीलिए पुरुष शासक पुरुष शासितों को अपना शिकार बनाते थे ताकि अपराध भी करें और उसका प्रमाण भी न रहे। साथ ही वंश-श्रेष्ठता भी बनी रहे। इस दिन-रात फैलती बीमारी का इलाज करने के लिए मैकाले ने समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करवाया था।
1861 के कानून के मुताबिक हर तरह की समलैंगिकता अपराध थी। जो डराकर, लालच देकर और बलपूर्वक कायम किया जाए, वह समलैंगिक रिश्ता तो अपराध था ही, उस रिश्ते को भी अपराध माना गया, जो दो वयस्क पुरुषों के बीच आपसी सहमति से होता था। इसके भी दो कारण थे। एक तो किसी शासित या पर-निर्भर से किसी भी मुद्दे पर सहमति लेना काफी आसान होता है और दूसरी बात, जो कि विक्टोरियाई इंग्लैंड में बहुत महत्वपूर्ण थी, वह यह थी कि स्त्री-पुरुष के समवाय से बनी परिवार नाम की संस्था की रक्षा!
समलैंगिकता याने परिवार-प्रभंजन! ईसाई नैतिकता का नकार! पति और पत्नी, दोनों ही एक-दूसरे को धोखा देने की छूट पा जाएंगे। दूसरे शब्दों में परिवार नामक संस्था अपने आप भंग या भग्न हो जाएगी। भारत में राज करनेवाले ब्रिटिश परिवार सही-सलामत रहें, इस दृष्टि से मैकाले ने ठीक ही किया।
लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि अंग्रेजों के विदा होते ही यह मुद्दा भी विदा हो गया? मुद्दा तो विदा हो गया, लेकिन वह अपनी कानून की दुम यहीं छोड़ गया। इस छोटी-सी दुम को दिल्ली उच्च न्यायालय ने अब काटकर फेंक दिया है। इस पर ताली बजाने या छाती कूटने की क्या जरूरत है?
इस छोटी-सी दुमकटाई को आखिर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? सारे टी वी चैनल और अखबारों के मुखपृष्ठ इस फैसले से रंगे हुए हैं। समलैंगिक स्त्री-पुरुष और उनके पैरोकार जश्न मनाते हुए दिखाए जा रहे हैं। इनसे कोई पूछे कि यह कौन-सी स्वतंत्रता है? यह कौन-सी गरिमा है? हमारे यहां तो ऐसा बर्ताव सभी के लिए वर्जित है, चाहे वे पति-पत्नी ही क्यों न हों? यह भारत है। यह ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस नहीं है। लेकिन हमारे यहां एक वर्ग है जो पश्चिम की गुलामी में लगा हुआ है। नकली समस्याओं और नकली समाधानों पर यह पगला जाता है।
समलैंगिकता के समर्थकों का यह तर्क तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है कि आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने वालों को पुलिस तंग करती है। कोई दो पुरुष या दो ी अपने शयन-कक्ष में स्वेच्छा और सहमति से क्या करते हैं, इससे दूसरों को क्या मतलब है? पुलिस उन्हें परेशान क्यों करेगी? पुलिस को पता कैसे चलेगा? जब तक दोनों में से कोई एक, शिकायत या चर्चा या प्रचार न करे, किसी को भी क्या पता चल सकता है?
आपने अपनी रसोई में बैठकर नींबू का अचार खाया है या आम का, इससे किसी तीसरे को क्या लेना-देना? पुलिस और अदालत को तभी बीच में आना पड़ता है, जब मामला जोर-जबर्दस्ती का हो। जोर-जबर्दस्ती ही बलात्कार है। वह समलिंगी हो या उभयलिंगी, वह गलत है, गैर-कानूनी है, अनैतिक है। स्वेच्छावाले कितने मामले पिछले डेढ़ सौ साल में पकड़े गए हैं और अदालत के सामने लाए गए हैं?
क्या कोई आंकड़ा उपलब्ध है? जिस नाज फाउंडेशन ने यह मामला अदालत में जीता है, उसके कर्ता-धर्ता को पुलिस ने दस साल पहले इसलिए पकड़ा था कि उन्होंने बेंगलुरू में लोगों को समलैंगिक रिश्तों का प्रशिक्षण देने के लिए बाकायदा कक्षाएं शुरू कर दी थीं। अगर कोई विषमलैंगिक रिश्तों का प्रशिक्षण देने लगे और उसमें भी यदि अश्लीलता आदि हो तो वह भी कानून की गिरफ्त में आ जाएगा।
दिल्ली की अदालत ने सहमति पर बहुत जोर दिया है, लेकिन कोई पूछे कि कौन-सी सहमति बड़ी है? स्थायी सहमति या तात्कालिक सहमतियां? विवाह स्थायी सहमति है। क्या उसे भंग करना कानूनी जुर्म नहीं है? चाहे विवाहित पुरुष का रिश्ता किसी परी के साथ हो या पुरुष के साथ, जुर्म तो वह है ही। वह व्यभिचार (एडल्ट्री) है।
इसीलिए समलैंगिक रिश्ता अपराध नहीं है, यह छूट उन्हीं पर लागू होती है जो विवाहित नहीं हैं। जिनके बारे में यह माना जाता है कि वे प्राकृतिक रूप से समलैंगिक पैदा होते हैं, उन्हें यह फैसला निश्चित रूप से राहत पहुंचाएगा। यह फैसला न तो सब प्रकार की समलैंगिकता, न सब प्रकार के समलैंगिक रिश्तों और न ही समलैंगिक विवाह को जायज ठहराता है। यह विवाहेतर समलैंगिकता को भी जायज नहीं ठहराता।
इसीलिए पश्चिमी समलैंगिकता के अंध-समर्थक जो उत्सव मना रहे हैं, वह बचकाना है। अदालत ने सिर्फ एक उपनिवेशवादी प्रावधान को रद्द किया है। उसने अनैतिकता और अश्लीलता का लाइसेंस नहीं बांटा है। अदालत ने अपने फैसले के समर्थन में जो लंबी-चौड़ी दलीलें दी हैं और नेहरू व मूलभूत अधिकारों का जिक्र किया है, वह अनावश्यक है।
फैसले के अनेक तकोर्ं का वे लोग दुरुपयोग कर सकते हैं, जो किसी न किसी रूप में यौन स्वच्छंदता के समर्थक हैं। ऐसे लोग कई बार अप्राकृतिक व्यवहारों को उचित समझते हैं। वे मानव समाज को पशु समुदाय के स्तर पर ले जाना चाहते हैं। क्या स्वतंत्रता के नाम पर कानून आदमी को इसकी इजाजत दे सकता है?
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून मानव जीवन के प्रत्येक पहलू का नियामक नहीं हो सकता। कानून राज्य की संतान है, लेकिन समाज राज्य से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। समाज अप्राकृतिक संबंधों को अपवाद तो मान सकता है, कुछ हद तक उनकी उपेक्षा भी कर सकता है, लेकिन उन्हें प्रोत्साहन नहीं दे सकता। वह अपनी जड़ें खुद क्यों खोदेगा? यदि ी-पुरुष के स्वच्छ संबंधों से बना परिवार ही नष्ट हो गया तो सृष्टि आगे कैसे बढ़ेगी? राज्य और समाज दोनों जीवित कैसे रहेंगे?
- लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।