भोपाल. बातों-बातों में ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ वाली कहावत कहना आपको घर-परिवार और मित्रों के बीच हंसी का पात्र बना सकती है। दाल की बढ़ती कीमतों के कारण कहावत बदल गई है और अब मुर्गी दाल के बराबर नहीं रह गई। शहर में चिकन की प्लेट से महंगी दाल हो गई है। इसका असर होटल, रेस्त्रां में थाली पर भी दिखने लगा है। थाली में दाल परोसी नहीं जा रही या फिर कीमत बढ़ाकर दी जा रही है।
शहर में शनिवार को तुअर दाल की कीमत अपने उच्चतम स्तर 83 रुपए प्रतिकिलो (थोक में) पर पहुंच गई, जबकि चिकन की कीमत 70 से 75 रुपए प्रतिकिलो पर बरकरार है। चिकन से बनने वाले व्यंजनों की बात करें तो शहर के मध्यम दर्जे के होटल-रेस्त्रां में आपको 70 रुपए प्लेट में मिल जाएंगे। हकीम होटल के संचालक जाकिर हुसैन के अनुसार चिकन करी से लेकर बटर चिकन की प्लेट 70 रुपए में मिल रही है। उधर मानसरोवर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में संचालित एमटीआर रेस्त्रां में थाली की कीमत ढाई सौ रुपए है।
होटलों में थाली हुई महंगी
दाल और अन्य खाद्य पदार्र्थो की कीमतों में बढ़ोतरी को देखते हुए शहर के छोटे होटल-रेस्त्रां संचालकों ने भी थाली की कीमतें बढ़ाना शुरू कर दी हैं। छोटे होटल रेस्त्रां संचालकों को थाली की कीमत में दस से पंद्रह रुपए तक बढ़ाना पड़ रहे हैं, जिन्होंने कीमत नहीं बढ़ाई वह थाली से तुअर दाल को अलविदा कहते हुए अलग से देने पर अतिरिक्त शुल्क ले रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो तुअर के साथ दूसरी दाल (मूंग, चना) मिलाकर पूर्ति कर रहे हैं। अन्य दालों की कीमतें भी एक माह में आठ से दस रुपए प्रतिकिलो तक बढ़ गई हैं। शहर में लगभग 40 बड़े और 150 छोटे होटल हैं। संचालकों के अनुसार इनमें भोपाल आने वाले करीब 25 हजार व शहर में अकेले और अस्थाई तौर पर रहने वाले करीब 75 हजार से अधिक लोग भोजन करते हैं।
जेब करना होगी ढीली
नियमित रूप से होटल, रेस्तरां या कैंटीन में खाना खाने वालों की जेब पर प्रतिदिन 25 से 30 रुपए का अतिरिक्त भार बढ़ने की आशंका बन आई है। कीमतों में हो रही बढ़ोतरी से प्रति व्यक्ति सामान्य भोजन खर्च 2000 तक पहुंच सकता है। अब तक ये प्रतिमाह के 1200 से 1500 रुपए खर्च करते थे। अकेले एमपी नगर में ही देखें तो होटल पर नियमित रूप से भोजन करने वालों की संख्या 15 हजार के करीब है। ऐसे में यदि थाली की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो उक्त लोगों को हजारों रुपए अतिरिक्त खर्च करना होंगे। होटल पर नियमित भोजन करने वाले शिवेंद्र परमार इस स्थिति से चिंतित हैं। उनका कहना है कि इससे पूरा बजट गड़बड़ा जाएगा।