चंपकवन में एक स्कूल था। सभी जानवरों के बच्चे उस स्कूल में पढ़ते थे। बच्चे वहां मिल-जुलकर पढ़ते,खेलते-कूदते और खाते-पीते।
मंटू बंदर और चंपू भालू एक ही क्लास में पढ़ते थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। एक दिन लंच के समय दोनों अपना-अपना टिफिन निकालकर खाने के लिए बैठे।
मंटू के टिफिन में घी लगी रोटी और सब्Êाी थी, जबकि चंपू के टिफिन में मिठाई और समोसे। मिठाई और समोसे खाते हुए चंपू की नÊार मंटू पर पड़ी, जो मÊो से अपनी रोटी और सब्Êाी खा रहा था। कुछ सोचते हुए चंपू ने एक मिठाई और एक समोसा मंटू की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘लो खाओ।’ मंटू को मिठाई और समोसा खाने में बड़ा मÊा आया।
‘क्या तुम रोÊा ही टिफिन में ये लाते हो?’ मंटू ने खाते-खाते पूछा। ‘नहीं, मैं तो टिफिन में रोÊा नई-नई चीÊों लाता हूं। कभी मिठाई- समोसे, कभी हलवा, कभी बर्गर, तो कभी टोस्ट।’
कहकर चंपू ने मंटू से पूछा, ‘तुम रोÊा टिफिन में रोटी और सब्Êाी ही लाते हो?’
‘नहीं, नहीं, मैं पूड़ी-सब्Êाी या दाल-पराठा भी लाता हूं,’ कहते-कहते मंटू की आवाÊा धीमी हो गई। फिर उसने कुछ सोचकर जवाब दिया, ‘मुझे यही खाना खाना अच्छा लगता है।’
‘मुझसे तो रोटी, पराठा और सब्Êाी खाई नहीं जाएगी। पता नहीं तुम कैसे ये रोÊा-रोÊा खा लेते हो?’ चंपू ने अजीब-सा मुंह बनाकर कहा।
अगले दिन जब मंटू के लिए उसकी मां टिफिन में रोटी-सब्Êाी रख रही थीं, तो उसने कल वाली बात याद करके मां को मना करते हुए कहा, ‘मैं रोटी-सब्Êाी नहीं खाऊंगा। कुछ और हो, तो दे दीजिए।’
मां परेशान हो गईं कि क्या दूं। तभी कुछ सोचकर बोलीं, ‘दाल भरकर पराठे बना दूं?’ ‘नहीं, मिठाई और समोसे हों, तो रखिए।’ मंटू ने कहा। ‘मिठाई और समोसे!’ मां हैरानी से बोलीं। ‘अच्छा मैं पैसे दे देती हूं। तुम स्कूल में खरीदकर खा लेना।’ कहकर मां ने उसे पैसे दे दिए।
लंच हुआ, तो मंटू ने लंबू जिराफ की दुकान से मिठाई और समोसे खरीदे और चंपू के पास बैठकर खाने लगा। उधर आज चंपू बर्गर खा रहा था। उसे बर्गर खाता देखकर मंटू ने सोचा, ‘कल मैं भी बर्गर खाऊंगा।’ अगले दिन उसकी मां जब फिर टिफिन में रोटी-सब्Êाी रखने लगीं, तो मंटू ने मना करते हुए मां से कहा, ‘मैं रोटी-सब्Êाी नहीं खाऊंगा।’
‘तो क्या दूं? क्या आज भी मिठाई और समोसे खाने का इरादा है?’
‘नहीं, आज मैं बर्गर खाऊंगा।’ मंटू ने कहा। कुछ सोचकर मां ने उसे बर्गर के लिए पैसे दे दिए क्योंकि मां उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थीं।
अब तो मंटू की रोÊा-रोÊा की आदत ही बन गई। वह टिफिन के बदले रोÊा नई-नई चीÊों खाने के लिए पैसे मांगता। यह देखकर उसकी मां को चिंता हुई।
‘घर का टिफिन खाने के बजाए मंटू रोÊा बाÊार से खरीदकर खाना क्यों चाहता है? मुझे कुछ करना पड़ेगा।’
उस दिन जब मंटू ने खाने के लिए पैसे मांगे, तो मां बोलीं, ‘बेटा, आज मेरे पास पैसे नहीं हैं। तुम दुकानदार से उधार मांगकर खा लेना।’
मंटू ने सोचा कि मां पैसे दे ही देंगी, तो उधार मांगने में हर्Êा ही क्या है? लंच के समय उसने लंबू जिराफ से उधार मांगा, तो उसने कहा, ‘मैं बच्चों को उधार नहीं देता।’ मंटू कुछ नहीं कह सका। मुंह लटकाए वह चंपू के पास गया। उसने सोचा कि चंपू उसे खाना Êारूर देगा लेकिन चंपू अपना खाना खा चुका था।
उस दिन उसे भूखा ही रहना पड़ा। उसकी आंखांे में आंसू आ गए। छुट्टी होते ही वह बड़ी तेÊाी से भागता हुआ अपने घर पहुंचा और कंधे से बस्ता उतारकर फेंकता हुआ मां से बोला, ‘मां, जल्दी से मुझे खाना दीजिए। भूख के मारे मेरी हालत खराब हो रही है।’
‘क्यों, आज तुमने स्कूल में कुछ खरीदकर नहीं खाया क्या?’ मां ने हंसते हुए पूछा।
‘उस लंबू जिराफ ने मुझे उधार नहीं दिया। वह बहुत बदमाश है,’ मंटू ने चिढ़कर कहा।
‘बेटा, घर का खाना छोड़कर दूसरों की देखा-देखी बाÊार से खरीदकर खाने के चक्कर में रहोगे, तो इसी तरह भूखा ही रहना पड़ेगा। हर घर में बच्चों की मम्मी अपने बच्चे की सेहत को ध्यान में रखते हुए टिफिन में खाना देती हैं। उसे छोड़कर बाहर का तला-पका खाना खाआगे, तो सेहत से खिलवाड़ करोगे। समझे।’
‘हां मां। कल मुझे रोटी और पालक की सब्Êाी रखकर देना। आपके हाथ की बनी पालक बहुत अच्छी लगती है। मां वो आंखों के लिए भी फायदेमंद है न?’ ‘हां बेटे। और सुनो, अपने दोस्तों को यह बात Êारूर समझाना ताकि वो भी अपनी मम्मी के हाथ का बना घर का खाना ही खाएं।’
हेमंत कुमार यादव, फारबिसगंज, बिहार