Bhopal
हादसे से सबक नहीं
Bhaskar Correspondent Monday, July 13, 2009 02:11 [IST]  

भोपाल. राजधानी के सुल्तानिया जनाना अस्पताल में हुई छह गर्भवती महिलाओं की मौत पर जांच कमेटी ने भले ही डॉक्टर्स को क्लीनचिट दे दी हो, लेकिन अस्पताल प्रबंधन की लचर व्यवस्थाओं के चलते यहां किसी अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता है। आंकड़े गवाह है कि यहां प्रसव के दौरान प्रतिमाह आधा दर्जन से अधिक महिलाओं की मौत हो जाती है। 27 जून को गर्भवती महिलाओं की मौत के बाद शासन और महिला आयोग ने अस्पताल प्रबंधन को व्यवस्थाएं सुधारने की हिदायत दी थी, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

जूनियर डॉक्टरों और नर्सिग स्टाफ के भरोसे : अस्पताल के सभी वार्ड जूनियर डाक्टर्स और नर्र्सो के भरोसे हैं। सीनियर डॉक्टर सिर्फ सुबह और शाम मरीज देखकर चले जाते हैं। ऐसे में इमरजेंसी में कोई गंभीर मामला आता है तो उसे जूनियर डॉक्टर ही देखते हैं। स्टाफ की कमी से जूझ रहे इस अस्पताल में 20 पलंग पर एक नर्स है, जबकि नियमानुसार पांच पलंग पर एक नर्स होना चाहिए। यही नहीं एक वार्ड में एक सीनियर डॉक्टर, चार जूनियर डॉक्टर होना चाहिए, जो नहीं हैं। एक वार्ड में केवल एक या दो जूनियर डाक्टर होते हैं, जिससे मरीजों को उचित उपचार नहीं मिल पाता है।

उपलब्ध नहीं हैं दवाएं: अस्पताल में दवाइयों की कमी हमेशा बनी रहती है। मरीजों के परिजनों को दवाइयां बाहर से खरीदना पड़ती हैं। राजधानी के उपनगर से आए श्याम कुमार पटेल (परिवर्तित नाम) ने बताया कि उनकी पत्नी को शुक्रवार को ऑपरेशन से बच्चा हुआ है ऑपरेशन के दौरान से लेकर वर्तमान तक सभी दवाइयां बाजार से खरीद रहे हैं। हम गरीब हैं पर यहां पर बोल दिया जाता है कि दवाई स्टोर में नहीं है बाहर से खरीद कर लाओ। मजबूरी है इसलिए दवाइयां बाजार से खरीद रहें है। यहीं नहीं अस्पताल में भर्ती होने के बाद हमें पत्नी की दो तीन जांचें भी बाहर से करवाना पड़ी।

चार दिन में एक मौत: अस्पताल में प्रसव के दौरान तकरीबन सात से आठ मौत प्रतिमाह होती हैं। जून-2009 में ही आठ मौतें हो चुकी हैं। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां वर्ष 2008 में 64 महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हुई। वर्ष 2007 में 69,वर्ष 2006 में 63 और 2005 में 65 मौतें हो चुकी हैं।

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