Bhopal
फूल कम, शूल ज्यादा मिले : डॉ. धनंजय
Bhaskar Correspondent Monday, July 13, 2009 02:13 [IST]  

भोपाल. हिंदी के आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा 14 जुलाई को 75वें वर्ष प्रवेश कर रहे हैं। इस अवसर पर अमृत महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। डॉ. वर्मा ने रविवार को संवाददाताओं के साथ अपनी साहित्यिक यात्रा के अनुभव बांटते हुए कहा कि एक आलोचक को फूल कम ही मिलते हैं। उन्होंने कहा कि यह तो नहीं कह सकता कि मुझे सफलता मिली, हां मैंने सार्थक जीवन जरूर जिया। 1955 से लिखना शुरू किया और अब तक लगभग 22 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

मेरे लेखन को लोगों ने पसंद किया। किसी ने आलोचना की तो किसी ने विरोध। एक गुरु के जीवन की सार्थकता यह है कि वह अपने शिष्य से शास्त्रार्थ में पराजित हो, जो विद्यार्थी मुझे मिले वो आज भी मुझे गुरु मानते हैं।

आपके रचनाक्रम का अनुभव कैसा रहा?

साहित्य में जो घराने होते है वो लेखकों को मारते ज्यादा हैं। जहां लेखक खुद गर्दन कटाने चला जाता है यह सोचकर कि कोई पत्रिका या अखबार में उसे जगह मिल जाएगी। साहित्य का एक व्यवसायिक पक्ष भी है। मैंने गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान दिया, मात्रात्मकता पर नहीं।

साहित्यकार सिर्फ सभाओं तक ही सीमित रह गए हैं, क्या कारण है?

अभिनय, चित्रकला, संगीत, फिल्म, यह सब साहित्य की तुलना में ज्यादा मनोरंजक हैं और तुरंत आनंद देते हैं। इसकी तुलना में साहित्य बुनियादी सौंदर्य बोध विकसित करता है जिसमें समय लगता है।

आपकी आने वाली कोई सार्थक कृति?

योजनाएं तो बहुत हैं, लेकिन भविष्य में उम्मीदें कम हैं। एक आत्मकथात्मक और जीवन चरित्रार्थात्मक पुस्तक लिख रहा हूं। एक लेखक कैसे धीरे-धीरे मरता है, किन कारणों और प्रलोभन से समाप्त होता है, यहीं थीम है इस पुस्तक की। इसमें चरित्र असली है।

Bookmark and Share


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: