महामहिम की मुद्रा में दिखे मंत्री
पीथमपुर में एक कंपनी के उद्घाटन समारोह में पिछले दिनों एक दिलचस्प नजारा सामने आया। लोकप्रिय उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय के जलवे यहां देखने लायक थे। प्रोटोकाल के विपरीत उनका भाषण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय भारी उद्योग राज्यमंत्री अरुण यादव के बाद हुआ। जब वे बोलने पधारे तो अपने चिर-परिचित रंग में दिखाई दिए। उन्होंने बेफिक्र अंदाज में मुख्यमंत्री का नाम लेकर पूछा कि क्यों शिवराजजी और कितने विदेशी निवेशक आ रहे हैं? अपने मंत्री के इस आक्रामक अंदाज के बावजूद सीएम ने पूरी शिष्टता से जवाब दिया कि छह, लेकिन उनकी यह शैली वहां कई अतिथियों व श्रोताओं को अटपटी अवश्य लगी। मंत्रीजी का यह दबंग अंदाज राजधानी के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बना है। वैसे जब मंत्री के रूप में दूसरी बार उनकी शपथ हुई तो बंगले के बाहर उनके एक भक्तनुमा समर्थक ने गौरतलब होर्डिग लगवाया था। इसमें वे सिंहासननुमा कुर्सी पर राजसी मुद्रा में विराजे दिखाए गए थे, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘न चिंता, न भय, मालवा सरकार की जय।’ अब मालवा की आवाज है तो दबंगता तो होगी ही।
हिम्मत ने दिखाई हिम्मत
अनुशासन को लेकर भाजपा की बैठकों में खूब कर्णप्रिय उपदेश सुने जाते रहे हैं। पार्टी में अनुशासनहीनता की बढ़ती शिकायतें अब उपदेशकों के लिए बैठकों में अप्रिय स्थितियां पैदा करने लगी हैं। पिछले दिनों सतना में कार्यसमिति की बैठक के लिए नेता जमा हुए। वरिष्ठ नेता हिम्मत कोठारी ने सबके बीच खरी-खरी कहने की हिम्मत दिखाई। बड़े नेता दम साधे सुनते रहे। सब जानते हैं कि पार्टी में क्या चल रहा है और अनुशासन के नाम पर बनी नाम मात्र की समिति कैसे हाथ पर हाथ धरे बैठी है, क्योंकि उसके पास एक शिकायत तक नहीं है। एक नेता ने टिप्पणी की कि सच कहना हिम्मत की बात है, लेकिन पार्टी अब कहीं कोठारीजी के कथनों को ही अनुशासनहीनता न मान ले। अगर ऐसा होता है तो कैलाश सारंग को अनुशासन समिति में करने को तो कुछ काम मिल ही जाएगा।
कांग्रेस मुख्यालय में कमरों पर कब्जे
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद पार्टी मुख्यालय के कमरों पर कब्जे की कवायद चल रही है। नेताओं की नजरें भूतल के उन कमरों पर हैं, जहां दो दिग्गजों की बैठक हुआ करती थी। कभी मानक अग्रवाल से रौनकदार रहे कमरे पर कांग्रेस महामंत्री केप्टन जयपाल सिंह का कब्जा है। इससे सटे एक और कक्ष पर नेताओं की नजरें हैं। यह अजय सिंह राहुल भैया को आवंटित था। उनके लिए कार्यालय के नाम पर एक और कक्ष था। इसमें सचिव अतुल शर्मा व महामंत्री ललित जैन का डेरा होगा। यह पार्टी में अंदरुनी तख्ता पलट है।
कुर्सी गई फिर भी सुविधाएं बरकरार
संस्कार और आदशरें का बखान करने वाली भाजपा के नेताओं का पद और पावर प्रेम भी गजब का है। दो सार्वजनिक उपक्रमों में अध्यक्ष के पद से मुक्त होने के बावजूद नेताओं का गाड़ी, बंगलों एवं सुविधाओं पर कब्जा बरकरार है। निगमों के अफसर बार-बार फरमान जारी कर रहे हैं, लेकिन उनके कानों पर जूं नहीं रेंग रही। इनमें नागरिक आपूर्ति निगम अध्यक्ष जसवंत सिंह हाड़ा और भण्डार गृह निगम अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह शामिल हैं। नमकहलाल फिल्म में अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए और किशोर कुमार के गाए गीत की एक पंक्ति याद आती है-राम नाम जपना, पराया माल अपना।
पांचवें साल में राज्यपाल का पांचवां राज्य
नव नियुक्त राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर केंद्र सरकार की नजरों में संकटमोचक बनकर उभरे हैं। महामहिम के रूप में पांच साल में मध्यप्रदेश उनके लिए चौथा राज्य है। डॉ. बलराम जाखड़ की जगह लेने के बाद जब राजस्थान के राज्यपाल एसके सिंह लंबी छुट्टी पर गए तो उनका अतिरिक्त प्रभार भी उनके कंधों पर आया। एक पारी में पांच राज्यों के राज्यपाल पद को सुशोभित करने का रिकार्ड शायद उन्हीं के नाम दर्ज होगा। उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक के बाद वे मध्यप्रदेश आए और लगे हाथों राजस्थान भी जेब में आ गया।
बुंदेलखंड के बांधों की सुध ले रहे बुंदेला
खजुराहो के सांसद जितेंद्र बुंदेला इन दिनों अपने इलाके के पांच बांधों के दस्तावेजों के पुलिंदे लिए जमीन-आसमान एक कर रहे हैं। सौ साल पुराने ये बांध उत्तरप्रदेश की सीमा के पास हैं। 1965 में दोनों राज्यों की कांग्रेस सरकारों के समय एक समझौता हुआ। नतीजे में बांध तो यहीं रहे, पानी का पूरा फायदा यूपी ने उड़ाया। अब फाइलें बुंदेलाजी के हाथों में हैं। वे पिछले दिनों मुख्यमंत्री से आकर मिले। इनमें एक बांध ऐसा भी है, जिस पर सिंचाई विभाग मजे से पानी की तरह पैसा बहाने में लगा है, जबकि यह बांध अपनी उम्र पूरी कर चुका है। बुंदेला इस पहल का श्रेय खुद नहीं लेते, बल्कि सत्यव्रत चतुर्वेदी, जेसी निगम और शंकरप्रताप सिंह का नाम भी जिक्र करते हैं, जिन्होंने इस मुद्दे को पहले उठाया। देखना है कि बांधों का कितना पानी पिछड़े बुंदेलखंड नसीब हो पाता है।
विधानसभा की मर्यादा तार-तार
वित्तमंत्री राघवजी खुद भले ही बजट पेश करते वक्त पूरे संजीदा थे, लेकिन संसदीय कार्यमंत्री कैलाश विजयवर्गीय, पंचायतमंत्री गोपाल भार्गव व पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा समेत सत्तापक्ष के अधिकतर सदस्यों के लिए अनुशासन के सबक पार्टी की बैठकों तक ही सीमित थे। बजट के दौरान विपक्षियों की टोका-टाकी के जवाब में मंत्रिपरिषद के सदस्य ही छींटकशी पर उतारू हो गए। सदन का माहौल बिगड़ना स्वभाविक था। मुख्यमंत्री पूरी तरह मौन रहे। इससे सदन की मर्यादा टूटी और बजट जैसे गंभीर विषय की महत्ता तार-तार होती दिखी। आश्चर्य तो ईश्वरदास रोहाणी की टिप्पणियों पर है कि कैसे वे लगातार बोलते जा रहे थे। पूर्व वनमंत्री विजय शाह तो अपनी सीट पर ऐसे आलथी-पालथी लगाए बैठे दिखे, जैसे गल्ले की दुकान पर विराजे हों।
शिक्षा विभाग के ‘सूबेदार’ सुरक्षित
शिक्षा विभाग में व्याख्याता और प्राचार्य के पदों पर पदोन्नति मामले में जिलों के ‘सूबेदार’ सुरक्षित बचे हुए हैं। मंत्री अर्चना चिटनीस ने दो संयुक्त संचालकों को तो निलंबित कर दिया, लेकिन असल खेल में कई जिलों के शिक्षा अधिकारी भी बराबर के हिस्सेदार हैं। उच्च श्रेणी शिक्षकों और व्याख्याताओं को पदोन्नति की सौगात देने में उन्होंने माथा देखकर तिलक लगाया और नेत्रहीनों की तर्ज पर रेवड़ियों की तरह सूचियों में नाम जोड़कर आगे बढ़ाए। रही सही कसर संयुक्त संचालक के स्तर पर पूरी हो गई और मामला इतना गरमा गया। अब मंत्रीजी जिलों के सूबेदारों पर क्या कार्रवाई करती हैं, इसका इंतजार विभाग में सबको है।
कांग्रेस ने दिखाया अपना असली कलर
लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस विधायकों से उम्मीद थी कि वे विधानसभा में ज्यादा ताकत से एकजुट दिखेंगे, लेकिन वे सदन में भी अपने कलर यानी गुटों में बंटे नजर आए। एक ठाकुर प्राध्यापक को उप सचिव बनाए रखने के लिए पार्टी के ठाकुर विधायकों ने ब्राrाण प्रदेश अध्यक्ष के समर्थक विधायक दल के उपनेता और उसी गुट के अन्य विधायकों के सवालों की मुखालिफत कर डाली। सिंगरौली मामले में अजय सिंह मौके पर गए तब तक सदन में स्थगन पर चर्चा हो गई। इसमें भी ठाकुर लॉबी फरार विधायक ब्रजेंद्र राठौर मामले पर चर्चा पर जोर देती रही। यहां तक कि महेंद्र सिंह कालूखेड़ा ने अपने ही दल के स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा को लालीपॉप कह दिया। इतना ही नहीं सरकार को बर्खास्त करने की राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से मांग करने का बयान भी दे दिया। कांग्रेस की इस स्थिति पर भाजपा सदन में और बाहर भी खूब मजे ले रही है।
युकां का नारा-वी आर नॉट ब्लाइंड
राहुल गांधी से प्रेरणा पाकर कांग्रेस में इन दिनों सर्वाधिक सक्रिय यूथ कांग्रेस ही दिख रही है। राजधानी में लगे बहुरंगी और बहुभाषी हर्ो्िडग्स से तो लग रहा है कि यह सुप्त संगठन शायद जाग उठा है। पहली बार किसी राजनीतिक संगठन ने जोशीले नारे अंग्रेजी में भी लगवाए हैं। इनमें परंपरागत तिलक चंदन लगाए युवा नेताओं के बड़े-बड़े फोटो के साथ अंग्रेजी में राज्य सरकार को चेताया है, वी आर नॉट ब्लाइंड।