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Sunday Special : पॉलीग्राफ टेस्ट की सच्चाई
Bhaskar Network Sunday, July 26, 2009 12:25 [IST]  

सच-झूठ का आईना
इन दिनों स्टार प्लस पर प्रसारित हो रहा रिएलिटी शो ‘सच का सामना’ विवादों के केंद्र में है। इस शो में शामिल होने वाले प्रतिभागियों से उनके व्यक्तिगत जीवन से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनके सही या गलत होने का फैसला पॉलीग्राफ टेस्ट के परिणामों के आधार पर होता है।



शो के एंकर राजीव खंडेलवाल की मानें तो पूछे जा रहे प्रश्नों का जवाब उन्हें भी नहीं मालूम होता है। चूंकि सही-गलत का निर्णय पॉलीग्राफ मशीन करती है, इसलिए यह जानना कम दिलचस्प नहीं होगा कि आखिर ये मशीन झूठ को पकड़ती कैसे है?



है क्या पॉलीग्राफ टेस्ट



पॉलीग्राफ टेस्ट या झूठ पकड़ने की मशीन एक खास किस्म का उपकरण है। यह मशीन रक्तचाप, नाड़ी की गति, श्वसन प्रक्रिया, सांस के उतार-चढ़ाव, शरीर का तापमान और त्वचा की रंगत से जुड़े बदलाव को मापने का काम करती है। जब कोई शख्स झूठ बोलता है, तो इस मशीन के जरिए उक्त स्तरों पर आने वाले बदलाव नोट कर लिए जाते हैं।



कितना सटीक है टेस्ट



इस तकनीक को काफी सटीक माना जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस परीक्षण के परिणाम अचूक ही होते हैं और इसमें गलती नहीं हो सकती है। फिर भी अमेरिकन पॉलीग्राफ एसोसिएशन ने इसके परिणामों की सटीकता जानने के लिए पिछले 25 वर्षो में 250 से अधिक शोध किए हैं। कंप्यूटर आधारित पॉलीग्राफ टेस्ट से जुड़े हालिया शोधों की सटीकता लगभग सौ फीसदी पाई गई है।



कैसे पकड़ा जाता है झूठ



मानव मनोविज्ञान के तीन पहलुओं की इसमें जांच की जाती है। श्वसन प्रक्रिया, त्वचा की रंगत में आने वाले बदलाव और रक्त के प्रवाह से लेकर नाड़ी की गति के आधार पर झूठ और सच का विभेद किया जाता है। जब कोई शख्स झूठ बोल रहा होता है, तो उसके शरीर और दिमाग में कई बदलाव आते हैं।



मसलन रक्त के प्रवाह की गति में कमी या वृद्धि देखी जाती है। दिल की धड़कनें तेज या धीमी पड़ जाती हैं। इसके साथ ही उसकी सांस लेने की शैली में भी अंतर महसूस किया जा सकता है। सामान्य स्थिति में उसके शारीरिक हावभाव और दिमागी स्थिति से अंतर पाए जाने पर मशीन झूठ का निर्धारण कर लेती है।



कैसी होती है मशीन



यह एक साधारण मशीन की तरह होती है, जिसके छह सेंसर्स या ‘वायर’ होते हैं। इन तारों को परीक्षण से गुजर रहे शख्स के शरीर के विभिन्न अंगों से जोड़ दिया जाता है। संबंधित शख्स के भीतर आ रहे बदलावों को एक खास पेन गतिशील कागज पर उकेरता है।



इन लाइनों को फॉरेंसिक साइको फिजियोलॉजिस्ट (एफपी) पढ़कर तय करता है कि किस प्रश्न पर संबंधित शख्स के भीतर बदलाव महसूस किए गए। कारण, यह लाइनें संबंधित शख्स के भीतर भावनात्मक उतार-चढ़ाव की स्थिति को परिलक्षित करती हैं।



इस परीक्षण की कानूनी वैधता



अमेरिका में पिछली एक सदी से पॉलीग्राफ टेस्ट हो रहा है। अमेरिका की तुलना में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में यह तकनीक नवजात ही कही जाएगी। सिंगापुर समेत अधिकांश देशों में पॉलीग्राफ टेस्ट और उसके निष्कर्षो को बतौर सबूत स्वीकार करने या न करने पर अदालत ने स्पष्ट व्याख्या नहीं की है।



जापान में इसे कानूनी मान्यता प्राप्त है, जबकि अमेरिका में यह संबंधित मामले में शामिल पक्षों पर निर्भर करता है कि वह इसे बतौर सबूत मानते हैं या नहीं। भारत में इस परीक्षण को प्रथम दृष्टया सबूत नहीं माना गया है, लेकिन जांच में इसका इस्तेमाल किया जाने लगा है।



पॉलीग्राफ टेस्ट के साइड इफैक्ट



यह एक दर्दरहित प्रक्रिया है। इसमें न तो बिजली के झटके लगते हैं, न ही तेज रोशनी या आवाज से संबंधित शख्स को गुजरना पड़ता है। इस प्रक्रिया के दौरान रक्तचाप नापने वाली पट्टी का सबसे ज्यादा अहसास बना रहता है। अंगुलियों में लगे तार भी झनझनाहट का अहसास देते हैं।



दूध का दूध और पानी का पानी
टेस्ट की समाप्ति पर एफपी वैज्ञानिक ढंग से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन करते हैं। सच या झूठ का दारोमदार आंकड़ों पर ही निर्भर करता है। अंत में कंप्यूटर एल्गोरिथ्म की मदद से आंकड़ों का अध्ययन किया जाता है। अंतिम निष्कर्ष आंकड़ों के आधार पर फैसला सुनाने वाले विशेषज्ञ पर ही निर्भर करता है।



टेस्ट की काट



पॉलीग्राफ टेस्ट को धता बताने से जुड़े नुस्खे और उपाय बताती तमाम इंटरनेट साइट्स हैं। हालांकि माना जाता है कि आदतन झूठ बोलने वाले, मजबूत इच्छाशक्ति या दिमाग पर नियंत्रण रखने वाले लोग ही इस मशीन को धोखा दे सकते हैं।

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