प्रेमचंद की हमने जो भी तस्वीर देखी, गभीर ही थी। प्रेमचंद के विषय में मेरे कई बुज़ुर्ग दोस्तों ने बताया था कि वह बड़ा ख़ुश रहने वाला व्यक्ति था, पर मैं जब भी उसकी गंभीर मुद्रा वाली तस्वीर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि वह व्यक्ति जैसे सदियों से कभी मुस्कुराया ही न होगा। गंभीर मुद्रा मंे बैठा प्रेमचंद यदि अचानक ही कहकहा-सा लगाकर हंस पड़ता, तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होती, पर साथ में हैरानी भी। बुज़ुर्ग कहते हैं कि लेखक और कलाकार मनुष्यों का, समाज का अनुभूतिशील शरीर होते हैं। प्रेमचंद तो बहुत ही अनुभूतिशील व्यक्ति थे।
मेरा विश्वास है कि जिस देश के आम लोग सुखी और खुशहाल नहीं होते, वहां के प्रेमचंद कभी भी मुस्कुरा नहीं सकते। कहकहे लगाना तो दूर की बात है। जहां के लोग सुखी नहीं होते, वहां का तो आकाश भी उदास होता है। प्रेमचंद ज़िंदगी भर कैसे ख़ुश हो सकते थे?
प्रेमचंद भारतीय मनुष्य की उस आधुनिक सोच का प्रतीक हैं, जिसने 1930 के बाद जागरूक होकर ज़िंदगी और ज़माने के बारे में सोचा। प्रेमचंद ने गांधीवाद तथा और हर तरह के राष्ट्रवादी विचारों को लेकर उपन्यास लिखे लिया, पर मुझे लगता है कि जब तक उन्होंने ‘गोदान’ का सृजन नहीं कर लिया उनकी आत्मा को चैन नहीं आया।
‘गोदान’ और हर प्रकार के समकालीन जीवन के प्रसंग के अलावा मूल रूप में एक ग़रीब व्यक्ति ‘होरी’ की कहानी है। जब हमने गोदान पढ़ा, तो उसके शेष सारे ही पृष्ठ हमारी आंखों के सामने से गायब हो गए। केवल होरी का प्रसंग ही ज़िंदा रहा।
यह उन दिनों की बात है जब मैं स्कूल की पढ़ाई छोड़-छाड़कर वर्कशॉप में अप्रशिक्षित कर्मी के तौर पर काम करता था और फालतू समय को भरने और आकर्षक बनाने के लिए तीर्थराम फ़िरोज़पुरी के जासूसी उपन्यास पढ़ा करता था। एक दिन मुझे लगा कि मैंने सारा ही तीर्थराम फ़िरोज़पुरी पढ़ लिया है, तो मैंने अपना ज़मानत का डेढ़ रुपया वापस मांगा। दुकानदार ने कहा, ‘तुमने प्रेमचंद का कोई उपन्यास पढ़ा?’
‘नहीं’ मैं तो उसे जानता भी नहीं।’ ‘फिर पढ़ो।’ और उसने सबसे पहले मुझे ‘गबन’ दिया, फिर ‘चौगाने हस्ती’ और फिर ‘निर्मला’ आदि। वे सारे ही उपन्यास मैंने उर्दू में पढ़े। उन उपन्यासों के पहले पृष्ठ गायब होते थे, जिससे किसी भी उपन्यास में से यह नहीं पता लगता था कि प्रेमचंद कौन है और वह कहां रहता है? तीर्थराम फ़िरोज़पुरी को पढ़कर ऐसा लगता था कि बस वही एक उपन्यासकार है, परंतु प्रेमचंद के बाद और कोई पसंद ही न आया।
प्रेमचंद का अंदाज़-ए-बयान बड़ा ही स्वाभाविक है और उनको पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे वह हमारे पास बैठे, हमारे साथ गु़फ्तगू कर रहे हों। मुझे लगने लगा था कि प्रेमचंद ज़रूर कोई साधारण व्यक्ति होगा, जिसने अपना दुखड़ा बयान करने के लिए यह उपन्यास लिखा। ‘प्रेमचंद स्कूलों के महकमे में इंसपेक्टर भी रहे हैं।’ कई फ़िल्मों के लिए भी लिखने का काम किया था।
वह व्यक्ति ख़ुद भी एक लेखक था और घर गृहस्थी की झंझटों ने उसे लेखक नहीं रहने दिया था। ‘प्रेमचंद न गृहस्थ?’ ‘ज़रूर होगा।’ ‘फिर वह कैसे लिखे जा रहा है?’ ‘भई लिखने के लिए इंसान के अंदर एक आग-सी भड़क रही होती है। पर मेरी आग अब मर गई है।’ वह चढ़ती जवानी के दिन थे और चाहे जीवन की गाड़ी कुछ समय के लिए अनिश्चित से मार्ग पर पड़ गई थी, पर मन में यह तमन्ना ज़रूर थी कि पढ़ाई करूंगा। प्रेमचंद की रचनाएं जूझने और बढ़िया ढंग से जीवन को प्रेरणा देने वाली हैं। आज मैं सोचता हूं कि यदि मैं प्रारंभ में ही प्रेमचंद को न पढ़ता, तो अब तक वर्कशॉप में लोहा तो पीट ही रहा होता, साथ ही यह भी निश्चित है कि कभी लेखक भी न बन पाता। जो व्यक्ति प्रेमचंद की तरह दुखी नहीं हो सकता, वह लेखक नहीं बन सकता। जो लोग बहुत खा-पीकर साहित्य में दहाड़ते हैं, वे पहलवान या नानवाई तो बन सकते हैं पर लेखक नहीं। हां, अधिक से अधिक वे कामेडियन बन सकते हैं।
एक दिन मैंने दुकानदार को पूछा कि कभी इस प्रकार नहीं हो सकता कि हम प्रेमचंद मिलें? वह केवल मुस्कुराया। ‘वह रहता कहां है?’ ‘प्रेमचंद तो बहुत समय पहले ही मर चुका है।’ उसने कठिनता से कहा। ‘यह कैसे हो सकता है।’ वह मेरी सहज-प्रतिक्रिया थी और मेरे दिल में कुछ धक्का सा साथ , जैसे कि मेरा पिता मर गया हो। ‘प्रेम चंद कैसे मर सकता है?’ मैंने ललकार के उसे कहा, पर उसने जवाब नहीं दिया। वह स्वयं भी प्रेमचंद का भक्त था और प्रेमचंद के उपन्यास मुझे पढ़ाकर मेरे मन में भी उसने प्रेमचंद की ज्योति जगा दी थी।