ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात
देसराज काली Friday, July 31, 2009 01:11 [IST]  

rafiमोहम्मद रफ़ी की श़िख्सयत के आगे शब्द छोटे पड़ गए हैं। रिच एंड रिगिंग वॉयस, हर तरह की डायमैंशन, हर तरह की फीलिंग, उनकी आवाज़ आज भी फ़िज़ाओं में तैर रही है और तैरती रहेगी। उच्चरण में सबसे परफैक्ट। एक-एक शब्द जैसे मोती हो। दूर कहीं उनकी आवाज़ गूंज रही हो, सुनने वाले के कानों में एक-एक शब्द पड़ता है और हृदय में गहरे उतरता जाता है। कोई शब्द ऐसा नहीं है, जो स्पष्ट न होता हो। इसीलिए कह रहा हूं परफैक्ट आवाज़। ऐसी आवाज़, जिसमें आंचलिकता का अंश दिखाई ही नहीं देता। आप बाला सुब्रमण्यम को सुन रहे हैं, मन्नाडे को सुन रहे हैं, तो आप महसूस करेंगे कि बंगाली आवाज़ है। महेंद्र कपूर को सुन रहे हैं, तो लगेगा कि किसी पंजाबी गायक को सुन रहे हैं। रफ़ी साहिब को सुन रहे हैं, लगेगा हिंदोस्तान को सुन रहे हैं। उनकी आवाज़ हिंदुस्तान की आवाज़ है।



पिता हाजी अली मोहम्मद के घर में कोटला सुलतान सिंह (नज़दीक अमृतसर) में जन्मे रफ़ी को उनके गांव के एक फ़क़ीर का आशीर्वाद बचपन में ही मिल गया था। उन्होंने संगीत का ‘सा’ उसी फ़क़ीर से सीखा। 1935-36 में उनका परिवार लाहौर चला गया। वहां उन्होंने हिंदोस्तानी क्लासिकल संगीत के सबसे बड़े नाम बड़े ग़ुलाम अली ख़ां साहिब, उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ां साहिब, पंडित जीवन लाल और फिरोज़ निज़ामी जी से संगीत की शिक्षा ली। ऐसे उस्ताद लोगों के क़दमों में बैठना किसी के भी जीवन की बहुत बड़ी प्राप्ति कही जा सकती है। इन लोगों का नाम शास्त्रीय संगीत में बहुत अदब से लिया जाता है। हम महसूस कर सकते हैं कि इन उस्तादों की आवाज़ की रूह को एक सशक्त रूप में रफ़ी साहिब ने क़ायम रखा है।



रफ़ी साहब को फ़िल्म इंडस्ट्री से जोड़कर देखें, तो वह एक युगपुरुष हैं। जिस भी एक्टर के लिए उन्होंने गाया, उसी के लिए गाया। आप महसूस कर सकते हैं कि वह राजिंद्र कुमार के लिए गा रहे हैं, शम्मी कपूर के लिए गा रहे हैं, दिलीप कुमार के लिए गा रहे हैं या धर्मेद्र के लिए गा रहे हैं। एक बार दिलीप कुमार जी ने अपनी एक मुलाक़ात में रफ़ी साहिब के बारे में बहुत ख़ूबसूरत बातें कीं। वह बता रहे थे फ़िल्मी दुनिया में तलत की आवाज़ का उन्हें बहुत सहारा रहा है। मगर तलत की पर्सनैलिटी एक जगह आकर रुक जाती है। यह समय फ़िल्म में सिनेमैटोग्राफी और तकनीक की डैवलपमैंट का समय है। क्लोज़अप का समय है। इस समय में स्क्रीन पर बड़े-बड़े चेहरे दिखाई देने लगते हैं। कोई एक्टर गा रहा है, तो उसके होंठ ही स्क्रीन पर हैं। यह बहुत मुश्किल समय था। उस लिप्सिंग को पकड़कर गाना किसी आम गायक के बस की बात नहीं थी। इस समय बहुत ही बुलंद आवाज़ की ज़रूरत थी। वह आवाज़ रफ़ी साहिब की आवाज़ के रूप में सामने आती है। सामने आती है और पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को अपनी आगोश में ले लेती है। केएल सहगल से लेकर तलत महमूद तक के सफ़र के बाद जो नया दौर है, उसमें सबसे शक्तिशाली आवाज़ रफ़ी साहिब की है।



नौशाद और रफ़ी साहिब का संगम शायद हिंदोस्तानी फ़िल्म के लिए एक अमूल्य ख़ज़ाना था। नौशाद के लिए उन्होंने 149 के लगभग गीत किए, जिनमें 81 सोलो थे। 1952 में आई फ़िल्म ‘बैजू बावरा’ में ‘ओ दुनिया के रखवाले’ और ‘मन तड़पत हरी दर्शन को आज’ गानों ने रफ़ी को नौशाद का महबूब बना दिया। इसके बाद लगभग सभी मेल वॉयस के लिए नौशाद की पसंद रफ़ी ही रहे। 1950 और 1960 के बीच में जिन महान संगीतकारों के साथ रफ़ी जी ने काम किया, उनमें ओपी नय्यर, शंकर-जयकिशन और एसडी बर्मन का नाम शामिल है। बरमन साहिब के साथ उन्होंने फ़िल्म ‘तेरे घर के सामने’, ‘प्यासा’, ‘काग़ज़ के फूल’, ‘गाइड’, ‘अराधना’ और ‘अभिमान’ में काम किया। बरमन जी ने देव आनंद को रफ़ी की आवाज़ दी।



अपने शुरुआती दौर से लेकर 1970 के अर्ध तक रफ़ी साहिब का नाम फ़िल्मी दुनिया में सबसे बड़ा रहा है। 1974 में उन्हें ‘तेरी गलियों में न रखेंगे क़दम आज के बाद’ गाने के लिए उन्हें फ़िल्म वल्र्ड मैग्ज़ीन बैस्ट सिंगर अवॉर्ड मिला। इस तरह उन्हें 1977 में फ़िल्म फेयर अवॉर्ड मिला। दुनिया भर में उन्हें सम्मान देकर नवाज़ा गया। 1980 की 31 जुलाई को दिल के दौरे के कारण रफ़ी साहिब हमें जुदाई दे गए। उनका आख़िरी गीत था- ‘शाम फिर क्यों उदास है दोस्त।’ अपने भीतर उतरता हूं, तो हर बार हर सिच्युएशन पर कहीं न कहीं रफ़ी गुनगुना रहे होते हैं। उनके बारे में लिख रहा हूं, बारिश हो रही है, मन गा रहा है- ‘ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात।’ सोच रहा हूं यह कौन-सा मुक़ाम है। रफ़ी की आवाज़ मन को क़ाबू किए हुए है। उनकी आवाज़ के बाहर जा ही नहीं पा रहा। कोशिश करके देखता हूं। व्यर्थ। आप सोचिए कि उनके बारे में पढ़ने के बाद उनकी आवाज़ के जादू से बच पाएंगे?

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