दो भाइयों के उतार-चढ़ाव की अजब कहानी
Bhaskar Sunday, August 02, 2009 07:13 [IST]  

Pathan चैंपियंस ट्रॉफी के लिए संभावित खिलाड़ियों की सूची में अपने भाई इरफान का नाम नहीं होने के बारे में सार्वजनिक बयान देने पर बीसीसीआई यूसुफ पठान के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगी या नहीं, मुझे नहीं पता। भारतीय क्रिकेट में मुंह बंद रखने की सख्त हिदायत दी जाती है, हालांकि इससे कोई भला नहीं होता।



यूसुफ ने खुद ही सफाई दी है कि उसने चयनकर्ताओं पर छींटाकशी नहीं की और उसकी बात को संदर्भ से काटकर पेश किया गया। इसके बावजूद इस ‘विवाद’ से इरफान फोकस में आ गया है और उसके उदाहरण से समझा जा सकता है कि कई बार प्रतिभाएं समय से पहले बर्बाद क्यों हो जाती हैं।



इरफान का मामला विनोद कांबली के मामले से अलग है जिसका हाल ही में मैंने इस कॉलम में जिक्र किया था। इरफान समर्पित और समझदार है, जीवनशैली और ट्रेनिंग को लेकर अनुशासित है। उसने अवसरों को गंवाया नहीं और कम से कम मैं उसके कॅरियर को खत्म नहीं मानता। मौजूदा हालत से उबरने के लिए इरफान को समझना होगा कि गड़बड़ी कहां हुई।



2003 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इरफान ने जैसी धमाकेदार अंतरराष्ट्रीय शुरुआतकी थी, वैसी कम ही क्रिकेटरों की शुरुआत होती है। वह सहजता से अंडर-19 की टीम से राष्ट्रीय टीम में आ गया। चैंपियन टीम के खिलाफ खेलते हुए उसके हौसले और लेफ्ट आर्म स्विंग बॉलिंग के हुनर की काफी तारीफ हुई थी। वह दौरा खत्म होते-होते इरफान शानदार बैटिंग भी कर रहा था और तब लगा कि भारत को आखिरकार कपिल देव का उत्तराधिकारी मिल गया है। अगले दो-एक सालों तक वह इन उम्मीदों पर खरा भी उतरा। लेकिन फिर अचानक 2006 से उसका फॉर्म और भविष्य धुंधला पड़ने लगा।



उन दिनों वह समझ नहीं पा रहा था कि भारतीय टीम में कौन-सी भूमिका निभाना चाहता था। उस वक्त के कोच ग्रैग चैपल उसे बल्लेबाज के रूप में विकसित करने पर तुले थे, जिसमें मुझे लगता है उसे भी मजा आ रहा था। नतीजतन उसने बॉलिंग पर कम ध्यान दिया। यह रणनीति कारगर नहीं हुई।



2006 में पाकिस्तान के खिलाफ कराची में उसने मैच के पहले ही ओवर में हैट्रिक लगाई थी। भारत वह टेस्ट हार गया। पर उस मैच के बारे में यह बात ज्यादा याद आती है कि वह आखिरी टेस्ट था जिसमें इरफान ने इतने जोश से मारक गेंदबाजी की थी। तभी से उसने पेस गंवा दी, एक्शन ज्यादा राउंड आर्म हो गया, लेफ्ट स्विंग भोथरी पड़ गई। बॉलिंग अटैक का सूत्रधार होने से भटककर वह हाशिये का बॉलर बनकर रह गया। उसने रनों का अंबार भी नहीं लगाया जिससे बल्लेबाज की तौर पर चुना जा सके।



उसका कॉलिंग कार्ड बॉलिंग था और जब वह धार उसने गंवा दी तो टीम में उसकी जगह भी पक्की नहीं रह गई। सीमित ओवरों के खेल के लिए अब भी उसे जरूरी समझा जाता है, लेकिन पिछले 12 महीनों से वनडे और टी20 मैचों में भी उसके स्थान को चुनौती मिल रही है। विडंबना और शायद गहरी करुणा की बात यह है कि दरअसल उसकी जगह किसी और ने नहीं, उसके भाई यूसुफ ने ले ली है। लिहाजा इरफान तो अपनी जगह के लिए छटपटा रहा है, वहीं यूसुफ का परचम लहरा रहा है। लेकिन वह एक बिल्कुल अलग ही कहानी है।



अपने भाई के बारे में यूसुफ के बयान से इरफान फोकस में आ गया है और उसके उदाहरण से समझा जा सकता है कि कई बार प्रतिभाएं समय से पहले क्यों बर्बाद हो जाती हैं।

- अयाज मेमन

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