इतिहास द्य राजा भोज ने 10वीं शताब्दी में मांडू का निर्माण करवाया। हालांकि 13वीं शताब्दी में दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने इसे अपने अधिपत्य में ले लिया और मालवा पर दिल्ली का शासन चला। 14वीं शताब्दी में इसका नाम शादियाबाद यानी सिटी ऑफ जॉय था। अफगान शासकों ने इसे अपने ही अंदाज में निर्मित किया।
आज यहां मौजूद इमारतें उस दौर की कई कहानियां बयां करती हैं। यह हिंदुस्तानी आर्किटेक्चर का नमूना भी पेश करती हैं। यहां की कुछ इमारतें बेहद सुंदर और देखने लायक हैं। बारिश में यह सुंदर नजारा पेश करती हैं।
जहाज महल द्य शानदार आर्किटेक्चर की मिसाल जहाज महल एक जहाज के आकार का है।
यह दो मंजिला इमारत एक समय में अफगान शासकों द्वारा हरम के तौर पर उपयोग की जाती थी। यहां आज बड़े-बड़े हॉल, स्नान का बड़ा सा अहाता है। यह तकरीबन 120 मीटर लंबा है और इसमें 12 दरवाजे हैं। इनमें सबसे ज्यादा देखने लायक दिल्ली दरवाजा है।
हिंडोला महल द्य इसे राजा गियासुद्दीन की संपत्ति माना जाता है, इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि यह किनारों पर से हिंडोले की तरह ढलवां है। इसके पास ही बड़ा सा और सुंदर चंपा बाओली कुआं है, जिसमें ठंडे और गरम पानी की व्यवस्था है। इसके साथ बनी दिलावर खान की मस्जिद और नाहर झरोखा भी देखने लायक है।
होशंगाशाह का मकबरा द्य भारत में संगमरमर से बना पहला मकबरा इसे ही माना जाता है। यह अफगानी आर्किटेक्चर का बेजोड़ नमूना है। इसके शानदार अंगों में बड़ा सा गुंबद, बड़े-बड़े दालान और मीनार शामिल हैं। माना जाता है कि इसके निर्माण के वक्त ताजमहल के निर्माण कार्य से जुड़े उस्ताद हामिद की भी सेवाएं ली गई थीं। यहां पर मौजूद सुंदर और विशालकाय जामी मस्जिद अपने बड़े दालान के लिए सबसे ज्यादा मशहूर है।
कैसे पहुंचें द्य यहां पहुंचने का नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर है, जो देश के कई प्रमुख हवाई अड्डों से जुड़ा हुआ है। रेल यातायात के लिए सबसे नजदीक रतलाम और इंदौर है। सड़क मार्ग से धार, इंदौर, भोपाल, उज्जैन और महू के रास्ते मांडू पहुंचा जा सकता है।