पौधों में आनुवांशिक बदलाव करके उनसे अधिक लाभ की फसले तैयार करने की तकनीक ने दुनिया भर में नए विवाद को जन्म दे दिया है। भारत में भी सरकार इसको लेकर अपना रुख जाहिर कर चुकी है। इससे विवाद और बढ़ गया है।
कुछ देशों में इस तकनीक पर रोक लगा दी गई है तो कुछ इसे भविष्य की जरूरत बता रहे हैं। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि भूख से लड़ने के लिए क्या इसका सहारा लेना ठीक होगा? इसके प्रभावों को आखिर कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है?
जेनेटिकली मोडीफाइड (जीएम) फूड को लेकर भारत में नया विवाद शुरू हो गया है। सरकार इस तकनीक से बने बैंगन, टमाटर और फूल गोभी को देश तीन सालों के भीतर बेचने की योजना बना रही है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने पहली बार जीएम फूड की पैरवी की है। इस तकनीक से होने वाले दुष्परिणामों को लेकर दुनिया के कुछ देशों ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है।
भारत में द इंडियन कॉन्सिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च एंड डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी ने तीन ट्रांसजेनिक फसलों को अनुमति दे दी है। अब इन पर विभिन्न प्रयोगशालाओं में परीक्षण और रिसर्च जारी है। इन टेस्ट्स के बाद इसकी रिपोर्ट जेनेटिक मैनीपुलेशन एंड द जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी के पास भेजी जाएगी। हालांकि इससे पर्यावरण की सुरक्षा पर खतरे की आशंका है। इससे पारिस्थितकीय और आर्थिक मुद्दों पर भी चिंता जताई गई है।
यह है जीएम फूड
सूक्ष्म जीवों के डीएनए में तकनीक के जरिए बदलाव किया जाता है। फिर बदले हुए डीएनए से भोज्य पदार्थ बनाए जाएं तो उन्हें जेनेटिकली मॉडीफाइड फूड कहते हैं। ऐसे जीवों के डीएनए में जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए बदलाव किया जाता है। जीएम फूड को पहली बार 1990 में मार्केट में लाया गया था।
ऐसे बनता है जीएम फूड
जेनेटिक इंजीनियरिंग वांछित लक्षणों वाले जीन की पहचान और उसे अलग करने की शुरुआत से होती है। इससे एन्जाइम्स पर प्रभाव पड़ता है। इसके बाद पौधे या जानवर का चयनकर यह जीन उसके जीनोम में जोड़ दिया जाता है। इसके लिए एग्रोबैक्टीरियम की मदद ली जाती है। इससे यह जीनोम का हिस्सा बन जाता है। इसके जरिये फसलें तैयार हो सकती हैं। जीएम तकनीक से बनी पहली फसल टमाटर (फ्लावरसैवर) की थी।
जीएम फूड की लेबलिंग
जीएम फूड और फूड प्रोडक्ट्स पर लेबलिंग को लेकर भी लगातार मुद्दे उठते रहे हैं। कृषि आधारित उद्योगों का मानना है कि लेबलिंग करना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। इसे डिमांड पर आधारित कर देना चाहिए। वहीं दूसरी ओर ग्राहक जागरूक संगठनों की मांग है कि जीएम फूड के बारे में चेतावनी लिखी होनी चाहिए।
चुनौतियां भी हैं
जीएम फूड तकनीक इतनी दमदार है कि वह दुनिया की भूख मिटाने की क्षमता रखती है। साथ ही पोषक तत्वों की समस्या, पर्यावरण बचाव और स्वास्थ्य आदि पर पड़ने वाले प्रभाव को दूर कर सकती है। सरकारों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। जीएम फूड की सुरक्षा परीक्षण, नियामन, अंतरराष्ट्रीय नीति और फूड लेबलिंग आदि पर विचार करना बाकी है। कई लोगों का मानना है कि एक न एक दिन दुनिया को जीएम फूड का सहारा लेना ही पड़ेगा।
जहरीला है प्रभाव
भारत में पर्यावरण कार्यकर्ता, धार्मिक संगठन, जनसंगठन, प्रोफेशनल्स, सरकारी अधिकारियों और वैज्ञानिकों के कुछ समूहों ने जीएम फूड को लेकर अपनी आवाज उठाई। उन्होंने कहा है कि इससे पर्यावरणीय नुकसान, मानव स्वास्थ्य को खतरे और आर्थिक चिंताओं में इजाफा होगा। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में बीटी कार्न के परागकणों को जहरीला बताया गया है। इसमें कहा गया की परागकणों से कुछ प्रजाति के पौधों पर प्रतिकूल असर पड़ता है जिससे उनकी मौत तक हो जाती है। वहीं बीटी के जहरीले प्रभाव के कारण कई प्रकार की प्रजाति के लार्वा मर जाते हैं।
अन्य देशों के साथ भारत में भी हो रही है रिसर्च
भारत सरकार ने जीएम फूड को लेकर अभी तक कोई नीति की घोषणा नहीं की है। वहीं दुनिया के कई देशों में जीएम फूड को लेकर चिंता बनी हुई है। विभिन्न देशों की सरकारे जीएम फूड के प्रभावों पर नजर रखी हुई है। वे जीएम प्लांट्स के विविधता पर अलग-अलग तरीके से रिस्पांस दे रही हैं।
जापान में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जीएम फूड का परीक्षण कराया। इसके बाद वहां सामान्य (बिना बदलाव किया गया) और जीएम फूड दोनों की बिक्री शुरू हुई।
भारत में फिलहाल कोई जीएम फूड और क्रॉप्स आदि उपलब्ध नहीं हैं। साथ भारत में इसे उगाया भी नहीं जा रहा है। भारत में जीएम फूड को लेकर हो रही रिसर्च जारी है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत में गरीबी कम करने और भोजन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए जीएम फूड का सहारा लिया जाएगा।
ब्राजील में जीएम फसलों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
यूरोप में जीएम फूड का जमकर विरोध हुआ लेकिन अब सुपर मार्केट में इसे जीएम फूड लेबल लगाकर बाजार में बेचा जा रहा है।
ब्रिटेन में मैड काऊ डिसीस और बेलजियम में पॉजिनस फूड समस्या के बाद लोगों का ध्यान जीएम फूड की ओर गया।
अमेरिका में जीएम फूड को लेकर नियामक प्रक्रिया में गफलत सामने आई है। अमेरिका में तीन अलग-अलग एजेंसियां होने से उनमें एक राय को लेकर दिक्कतें सामने आई है। अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (ईडीए) ने भी कीटनाशकों के जोखिमों का अध्ययन किया है। अमेरिका में विभिन्न फसलों पर कीटनाशकों के प्रयोग के मानक भी तय किए गए हैं।
जीएम फूड : भूख का विकल्प ?
फायदे...
दुनिया में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और आने वाले पचास सालों में यह बढ़कर 12 अरब से अधिक हो सकती है। इस कारण आने वाले सालों में भोजन की पूर्ति करना बड़ी चुनौती होगी। इससे निपटने के लिए जीएम फूड एक उपाय हो सकता है।
इस तकनीक से विकसित देशों के किसानों की स्थिति सुधर सकती है। इसे अपनाने से रोग, कीटाणु और अन्य कारणों से टमाटर आदि की फसलों पर होने वाला प्रभाव कमजोर पड़ जाता है।
कीटनाशकों के उपयोग से बनी फसलों को पसंद नहीं किया जाता। खरीदार को डर रहता है कि इन्हें खाने से उसे भयंकर रोग हो सकते हैं।
किसान खरपतवारनाशकों का प्रयोग करते हैं। इससे पर्यावरण को नुकसान होता है जबकि तकनीक से ऐसा नहीं होता।
पौधों को वायरस, बैक्टीरिया और अन्य से होने वाली बीमारियों को रोकने की तकनीक पर वैज्ञानिक काम कर रहे हैं।
ठंडे पानी की मछलियों के शरीर में पाने जाने वाले एंटीफ्रीजिंग जीन के जरिए ऐसी तकनीक विकसित कर ली गई है।
नुकसान...
इस तकनीक पौधों के कारण कीटनाशकों की क्षमता कमजोर हो जाती है। पौधों पर कीटनाशकों का असर कम हो जाता है, साथ ही खरपतवार भी दवाओं के प्रतिरोधी हो जाते हैं। ये पौधे मनुष्य और जानवरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। परागकणों के जरिए दो पौधों में जीन का आपसी बदलाव हो जाता है।
अमेरिका और यूरोप के कई बच्चों को एलर्जी होने के मामले सामने आए हैं। उन्हें मूंगफली और अन्य फूड के कारण गंभीर एलर्जी हुई। ऐसा माना जा रहा है कि ऐसे फूड में एक जीन होता है जो एलर्जी और उससे होने वाली प्रतिक्रिया का कारण बनता है।
इस बारे में सहमति बढ़ रही है कि विदेशी जीन मिलने से पौधों में बदलाव आता है जो मानव स्वास्थ्य के लिए दुष्प्रभावों को पैदा करता है।
इस तकनीक के आ जाने से बीजों के दामों में इजाफा होगा। इससे तीसरी दुनिया के किसानों की हालत बिगड़ जाएगी। वहीं जीएम फूड को मार्केट में लाना लंबी और महंगी प्रक्रिया है।