Health
मनचाहे गुणों वाली संतान यानी डिजाइनर बेबी
Bhaskar.com Wednesday, August 05, 2009 15:19 [IST]  

designer babyमनचाहे गुणों से युक्त संतान की संभावना ने चिकित्सा जगत में हलचल मचा दी है। एक वर्ग जहां इसे समय की जरूरत बता रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे नैतिकता से जोड़कर देख रहा है। इसके बावजूद इस बहस से इतर इस दिशा में तमाम प्रयास जारी हैं। बता रही हैं लबोनिता घोष।



इसी वर्ष जनवरी माह में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के डॉक्टरों ने एक ऐसे बच्चे को जन्म देने का दावा किया, जिसे ताउम्र ब्रेस्ट कैंसर नहीं हो सकता है। इसके एक माह बाद ही लॉस एंजिलिस के एक निजी क्लीनिक ने मनचाहे गुणों वाली संतान के जन्म को संभव बनाने का दावा पेश कर दिया। उन्होंने इसके लिए आईवीएफ(इन-व्रिटो फर्टिलाइजेशन) तकनीक का सहारा लिया।



इसे देखते हुए कह सकते हैं कि अब वह दिन दूर नहीं जब हम नियंत्रित पैतृक गुणों वाले बच्चे को जन्म दे सकेंगे। यह अलग बात है कि चिकित्सकीय विकास से जुड़ी इन तकनीकों को कुछ लोग नैतिकता के तराजू में भी तौल रहे हैं। इससे जुड़े अन्य पहलुओं में भी सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है संतान के गुणों का निर्धारण, जिसे संभव बनाया है पीजीडी (प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस) प्रक्रिया ने। इस प्रक्रिया को डॉक्टर अभी तक सिर्फ मानव भ्रूण में आनुवांशिक खामियों की पहचान के लिए ही मान्यता देते थे, लेकिन अब इसके जरिए मानव सभ्यता डिजाइनर बेबी की तरफ एक कदम और बढ़ा सकती है।



पीजीडी प्रक्रिया को लेकर कृत्रिम गर्भ धारण कराने वाले भारतीय विशेषज्ञ हाय-तौबा मचा सकते हैं। दुनिया के किसी अन्य देश की तरह पीजीडी की भारत में भी प्रासंगिकता सीमित ही मानी जाती है। इसके जरिए जन्म लेने वाले बच्चों में जन्मजात या आनुवांशिक खामियों मसलन डाउन सिंड्रोम, थेलेसीमिया या हीमोफीलिया का ही पता लगाया जाता है। इसके बाद अभिभावक तय करते हैं कि उन्हें बच्चे को जन्म देना है या नहीं। जसलोक अस्पताल में असिस्टेड रिप्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स विभाग की निदेशक डॉ. फिरोजा पारिख के मुताबिक, ‘इस प्रक्रिया को अमल में लाने के कड़े नियम-कायदे हैं। लिंग या गुण आधारित बच्चे को जन्म देने के लिए इस प्रक्रिया का उपयोग प्रतिबंधित है।’ वहीं इंडियन सोसायटी फॉर असिस्टेड रिप्रोडक्शन के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. महेन्द्रा वी पारिख कहते हैं, ‘नियम-कायदों से रहित माहौल में बस कुछ समय की बात है, जब इस सुविधा का दुरुपयोग शुरू हो चुका होगा।’



फिर भी असिस्टेड रिप्रोडक्शन प्रक्रिया में ऐसा बहुत कुछ है, जिसका लोग स्वागत कर सकते हैं। आईवीएफ तकनीक की अगुवा डॉ. इंद्रा हिंदुजा के मुताबिक, ‘इस नए कदम से चिकित्सकीय लाभ भी जुड़े हुए हैं। हम महिलाओं के अंडाणुओं की क्लोनिंग की दिशा में काम कर रहे हैं। इस तरह आकार लेने वाले भ्रूण से आप स्टेम सेल तैयार कर सकते हैं।’ इस दिशा में डॉ. हिंदुजा के साथ काम कर रहा दल महिलाओं के लिए ‘ओवरी बैंक’ की अवधारणा पर भी काम कर रहा है। यह एक ऐसा बैंक होगा जहां महिलाएं किसी गंभीर बीमारी के क्रम में अपने अंडाणु सुरक्षित रख सकेंगी, जिसका बाद में प्रजनन के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। जसलोक अस्पताल में डॉ. पारिख और उनकी टीम आईवीएफ के जरिए गर्भधारण की दर को चालीस फीसदी से साठ फीसदी तक पहुंचाने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए एक रास्ता भ्रूण के क्यूम्युलस एडेड ट्रांसफर (सीएटी) का भी अपनाया गया है।



डॉ. महेंद्र पारिख का मानना है कि इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा पुरुषों को मिलेगा। वह कहते हैं, ‘इसके पहले तक कम शुक्राणु वाले पुरुष संतान उत्पत्ति को लेकर सशंकित रहते थे। आज विकसित तकनीक के बलबूते एक अकेला शुक्राणु भी प्रजनन के लिए पर्याप्त होगा।’ इंट्रेसीटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आईसीएसआई) प्रक्रिया के तहत एक अकेले शुक्राणु को एक अंडाणु के संपर्क में लाया जाएगा, जिससे प्रजनन की संभावनाएं और भी बढ़ जाएंगी।



आईवीएफ तकनीक अब पहले की तुलना में सस्ती भी हो गई है। ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड द डेक्कन आईवीएफ क्लीनिक चलाने वाले डॉ. गौतम इलाहबादिया ने छह माह पहले आईवीएफ लाइट सुविधा शुरू की थी। वह बताते हैं, ‘आईवीएफ तकनीक से एक आशंका अंडाशय में अत्यधिक उत्तेजना की रहती है, जबकि आईवीएफ लाइट प्रक्रिया से तीन या चार अंडाणुओं के निर्माण के लिए कम से कम उत्तेजना की जरूरत होती है। नतीजतन कम से कम दवाओं की जरूरत पड़ती है। इसी वजह से यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत सस्ती पड़ती है। जहां आईवीएफ की नियमित प्रक्रिया में 50 हजार रुपए प्रति साइकिल खर्च आता है, वहीं आईवीएफ लाइट में खर्च आधा ही रह जाता है।’ फिर भी व्यावहारिक स्तर पर नियम-कायदों के अभाव में कृत्रिम गर्भाधान की किसी भी प्रक्रिया का दुरुपयोग संभव है। मेडिको-लीगल प्रोफेशनल डॉ. निखिल दत्तार कहते हैं, ‘आईवीएफ तकनीक को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देश ही महती भूमिका निभाते हैं।’ महिला विशेषज्ञ दुरु शाह कहती हैं, ‘जब तक इस क्षेत्र के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश संसद में पारित होकर कानून का रूप अख्तियार नहीं कर लेते, तब तक पीजीडी से जुड़ी स्टेम सेल, क्लोनिंग या लिंग निर्धारण सरीखी प्रक्रियाओं पर नैतिकता की तलवार लटकती ही रहेगी।’




लोग सोच सकते हैं कि हम प्रकृति को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन सच्चई यह है कि हम तो उसके करीब भर जाने की कोशिश कर रहे हैं। हमें यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए। डॉ. फिरोजा पारिख, इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट



सबसे पहला



विश्व में पहला आईवीएफ बेबी : लुई ब्राउन के रूप में ब्रिटेन में जुलाई 1978 में पैदा हुआ।



भारत में पहला आईवीएफ बेबी : मुंबई में 6 अगस्त 1986 को हर्षा चावड़ा का जन्म हुआ।

Bookmark and Share


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: