हताश रामगोपाल वर्मा की ‘अज्ञात’
जयप्रकाश चौकसे Thursday, August 06, 2009 12:15 [IST]  

रामगोपाल वर्मा दक्षिण भारत से आए हुए फिल्मकार हैं, परंतु उनका नाम ठेठ उत्तर भारतीय है। हिंदी की खास जानकारी नहीं होने के बावजूद उन्होंने अपनी फिल्मों के नाम ‘नि:शब्द,’ ‘रात,’ ‘द्रोही’ इत्यादि रखे हैं। उनकी ताजा फिल्म ‘अज्ञात’ जल्द प्रदर्शित होने जा रही है, जिसकी शूटिंग उन्होंने श्रीलंका के जंगलों में की है। फिल्म की शूटिंग में भाग लेने वाले किसी भी कलाकार को उन्होंने क्लाइमैक्स नहीं सुनाया है।



film agyat ramgopal varma jaiprakash chowkseyनतीजतन पूरी फिल्म करने के बावजूद किसी भी कलाकार को नहीं मालूम कि फिल्म का क्लाइमैक्स क्या है! अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास ‘टेन लिटिल निगर्स’ पर आधारित हिंदी फिल्म ‘गुमनाम’ बनी थी। इसमें दस लोगों को एक अज्ञात व्यक्ति एक द्वीप पर आमंत्रित करता है, जहां एक के बाद एक व्यक्ति की हत्या होती है और सब हैरान हैं कि कातिल कौन है? अंत में बचे दो लोग एक-दूसरे से डरे हुए हैं और क्लाइमैक्स में ज्ञात होता है कि कातिल दस लोगों के दल में शामिल था और स्वयं की तथाकथित मृत्यु को उसने अंजाम दिया था ताकि उस पर कोई शक न करे।



रामगोपाल वर्मा की ‘अज्ञात’ उपरोक्त कथा पर आधारित नहीं है, परंतु क्लाइमैक्स कुछ ऐसा ही है। यह भी संभव है कि वे मनोज नाइट श्यामलन की फिल्म ‘द विलेज’ से प्रभावित हों, जिसमें जंगल के मुहाने पर बसे गांव के लोगों के भय का विवरण है।



रामगोपाल वर्मा को बड़ी शिद्दत से एक अदद सफलता की दरकार है, क्योंकि बतौर फिल्मकार सिनेमा की मंडी में अब उन्हें ‘चेक’ नहीं वरन ‘हुंडी’ माना जाता है। उनसे बिछड़ गए हैं सारे पूंजी निवेशक बारी-बारी और अब उन्हें कष्ट दे रही है जमाने की यारी। आज फिल्म उद्योग का कोई सफल कलाकार उनके साथ काम नहीं करना चाहता। कभी आमिर खान, बच्चन परिवार और संजय दत्त जैसे सितारों के साथ आसानी से काम करने वाला फिल्मकार आज सितारा तो दूर रोशनी की एक खफीफ सी लकीर के लिए तरस रहा है। यह बात अलग है कि उनका अहंकार उन्हें अपने एकाकीपन को स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता। यहां एकाकीपन अलग-थलग पड़ जाने के भाव से लिखा गया है।



रामगोपाल वर्मा प्रतिभाशाली हैं और ‘शिवा’ तथा ‘रंगीला’ से उनकी धाक भी जम गई थी। प्रयोग के लिए प्रयोग करते हुए उन्होंने ढेरों असफल फिल्में दीं। राज कपूर की पहली फिल्म ‘आग’ में संवाद है कि काश मैं स्त्रियों के प्रति इतना आकर्षित नहीं होता, तो मेरा जीवन ही कुछ और होता। यह बात वर्माजी पर लागू होती है। उर्मिला मातोंडकर को सितारा बनाने के बाद उन्हें यह गुमां हो गया कि वे ईश्वर की तरह सितारों को जन्म दे सकते हैं। उन्होंने इस तथ्य को अनदेखा किया कि उर्मिला मातोंडकर में जन्मजात प्रतिभा थी, जिसका प्रमाण वह शेखर कपूर की फिल्म ‘मासूम’ में बाल भूमिका निभाकर दे चुकी थीं। बहरहाल रामगोपाल वर्मा ने अंतरा माली और निशा उर्फ प्रियंका कोठारी को सितारा बनाने के फेर में दर्जन भर असफलताएं रच दीं।



दुख इसलिए होता है कि उनकी माध्यम पर इतनी गहरी पकड़ है कि अजय देवगन, विवेक ओबेराय और मनीषा कोईराला अभिनीत फिल्म ‘कंपनी’ बिना लिखित पटकथा के बना ली और एक तरह से आशु फिल्मकार बन गए। अपने द्वारा अवसर दिए गए कलाकारों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति मानने के कारण मनोज बाजपेयी, विवेक ओबेराय इत्यादि कलाकार छिटक गए। एक बेचारे सहारनपुरी राजपाल यादव वफा निभाए जा रहे हैं। बहरहाल एक अदद सफलता मिलते ही रामगोपाल वर्मा अपनी पुरानी अकड़ में आ जाएंगे और नई फिल्म का नाम होगा ‘हम नहीं सुधरेंगे।’

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