भोपाल कहने को तो प्रदेश की राजधानी है पर यहां के सरकारी मकानों की हालत देखकर विश्वास नहीं किया जा सकता है कि वाकई यह राजधानी है। न्यू मार्केट के दशहरा मैदान के पीछे बनी सरकारी कॉलोनी हो या फिर शिवाजी नगर के मकान, सबके सब जर्जर हो चुके हैं। कहीं दीवार झड़ रही है तो कहीं खिड़की दरवाजे भगवान भरोसे हैं। समझ में यह नहीं आता है कि आखिर पीडब्ल्यूडी विभाग का काम क्या है। हम लोग जब भी पीडब्ल्यूडी के सेक्शन ऑफिस में जाकर कोई शिकायत दर्ज करवाते हैं तो जवाब मिलता है कि बजट नहीं है। समझ नहीं आता है कि जब सरकार हर साल बजट आवंटित करती है तो वो जाता कहां है। मेरे मकान के दरवाजे खिड़कियां कमजोर हो चुके हैं और लगभग टूटने की हालत में हैं। पिछले एक साल से कोशिश कर रहा हूं कि पीडब्ल्यूडी इसे बना दे पर उनके कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। मैंने तो इंजीनियर से यह भी कहा कि मैं अपने खर्चे पर इसे सुधरवा लेता हूं, लेकिन उन्होंने कहा कि सरकारी मकान में कोई भी बदलाव नहीं किया जा सकता है। इससे मकान खाली करते समय परेशानी आ सकती है। अब बताइए न तो सुधारते हैं और न ही सुधारने देते हैं।
धर्मेंद्र मिश्रा, शिवाजी नगर