एक मासिक पत्रिका के तौर पर ‘समावर्तन’ को साफ़-सुथरी छवि वाली पत्रिका की पहचान मिलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई। प्रधान संपादक रमेश दवे के साथ एक पूरी टीम ने इसे सुव्यवस्थित और नियमित करने की भरपूर कोशिश की है।
प्रत्येक अंक में एक लेखक को केंद्र में रखा जाता है। इस बार ज्योत्सना मिलन केंद्र में हैं। उनका आत्मकथ्य, साक्षात्कार और कविताएं शामिल की गई हैं। रमेश दवे के साथ बातचीत में उन्होंने खुलकर बातें की हैं। उन्होंने रचनाओं के अमूर्तन के सवाल पर कहा कि जैसे अगर जन्म है, तो मृत्यु का होना अनिवार्य है, उसी तरह मूर्त अगर है, तो अमूर्त उससे ज़रा भी कम नहीं हो सकता।
निर्मल वर्मा ने उनकी कहानियों के बारे में लिखा था- हिंदी कहानी के परिदृश्य में ज्योत्सना मिलन की कहानियां एक अनूठे ‘अदृश्य’ को उजागर-सा करती जान पड़ती है। ‘अभिमुख’ के तहत रमेश दवे ने कहा कि हम जिस समय में हैं, वह न हमारा, न हमारी आस्था, न पसंद का समय है और न ही साहित्य का समय। अब तो मीडिया और मार्केट का समय है।
‘हिंद स्वराज’ के पाठ का सिलसिलेवार प्रकाशन भी शुरू किया गया है, क्योंकि 1909 में लिखी यह पुस्तक सौ साल बाद भी प्रासंगिक है। रंगशीर्ष के तहत आर. सी. भावसार की चित्रकला पर रमेश दवे का अच्छा लेख है।
पोस्टमॉडर्न दौर में
‘संदर्श’ केवल घोषणा के तौर पर ही नहीं, सचमुच साहित्य और विचार की पत्रिका बन चुकी है। सुधीर विद्यार्थी बड़ी मेहनत और संघर्ष से इसे निकालते हैं। उद्य प्रकाश ने दिनेश के साथ साक्षात्कार में कहा कि पोस्टमॉर्डनिस्ट कहते हैं कि पूरा ब्रह्मांड शोर से भर गया है।
हर कोई बोल रहा है, बड़बड़ा रहा है, यह अचानक साहित्य में भी शिफ्ट हुआ, जो बोलने वाले लोग हैं, वह उसी तरह से ऊपर आ गए हैं, जैसे क्रिकेट कमेंटेर्ट्स हैं, जैसे पॉलीटिकल कमेंटेर्ट्स हैं, जैसे बिग फाइट के एंकर हैं। हमारे यहां हो यह रहा है कि कोई समाजशास्त्र पर लिख रहा है और सरद जोशी सम्मान पा रहा है, पुलिस डिपार्टमैंट पर लिख रहा है, तो शमशेर पुरस्कार पा रहा है।
-तरसेम गुजराल