नब्बे साल तक की उम्र के लोगों पर किये गए सर्वे के अनुसार इंसान की उम्र जैसे-जैसे बढती जाती है, वह उतने ही खुशमिजाज़ होते जाते हैं और उनका अपनी भावनाओं पर बेहतर संतुलन भी कायम हो जाता है।
एक ब्रिटिश न्यूज़ चैनल के अनुसार मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य को अनेक प्रकार की परेशानियां और तनाव घेर लेती हैं जैसे - स्वास्थय , आय , सामाजिक स्थिति , दुःख आदि । इनसे संबंधित परेशानियों के बावजूद जीवन के कुछ आखिरी दिन सुनहरे होते हैं। उन्होंने पाया की बुजु़र्ग उन परिस्थितियों से बचते हैं जो उन्हें दुःख या परेशानी दे सकते हैं। उन्होंने अमेरिकन साइकोलोजिकल एसोसिएशन से कहा की युवाओं को भी ऐसा ही करना चाहिए ।25 साल से भी कम समय में इंग्लैंड में हर चार में से एक व्यक्ति 65 वर्ष से ऊपर का हो चुका होगा और 85 वर्ष से ऊपर के लोगो की संख्या दुगनी हो चुकी होगी। साथ ही माना जा रहा है की सन् 2030 तक करीब 30,000 हज़ार लोग 100 साल की उम्र पार कर चुके होंगे।कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के मनोवाज्ञानिक डॉ. सुसन तुर्क चार्ल्स के अनुसार इस तरह से इंग्लैंड एक खुशहाल समाज बन सकता है। अनेक शोध पत्रों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने पाया कि आमतौर पर लोगो की मनः स्थिति बढती उम्र के साथ और संतुलित होती जाती है।
स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ लौरा कार्सतेनसेन ने 18 से 90 वर्ष के लोगों को एक प्रयोग के अंतर्गत अपनी भावनात्मक स्थिति को नियमित रूप से अपनी डायरी में लिखने को कहा। उन्होंने पाया कि उम्र दराज़ लोग युवाओं के मुकाबले कम नकारात्मक स्वाभाव के होते हैं, साथ ही वे अपनी आलोचना के प्रति जादा सहनशील भी होते हैं। वे लोग बढ़ती उम्र के साथ अपनी भावनाओं में बेहतर संतुलन भी बना सकते है ।डॉ चार्ल्स कहती है कि कार्सतेनसेन के प्रयोग के आधार पर हम यह कह सकते है कि लोगों की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है उन्हें इस बात का एहसास हो जाता है कि उनके पास कम समय बचा है। वे उस समय को पूरी तरह जीना चाहते हैं और इसलिए दुखी करने वाली परिस्थितियों से दूर रहते हैं। उनकी समझ जिंदगी और लोगों के प्रति बेहतर हो चुकी होती है इसलिए भी वह चिंताजनक परिस्थितियों से बचने में सफल होते है डॉ कार्सतेनसेन कहती हैं कि युवाओं को अपने बुढा़पे की तैयारी करनी चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे अपने दिनचर्या में स्वास्थय का ध्यान रखें और घर और ऑफिस के अलावा भी लोगों से मेल जोल बनाए।आमतौर पर बुढा़पे को लोग डर और चिंता की दृष्टि से देखते हैं। लोग समझते हैं कि बुढा़पा सिर्फ बीमारी, कमजोरी, और दूसरों पर आश्रित होने का नाम है, लेकिन यह सच नहीं बहुत से बूढे लोग अपने अनुभव और जीवनशैली के कारण चुस्त-दुरुस्त होते हैं। ऐसा नहीं है कि उम्र दराज़ लोग समाज में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे सकते। यह शोध दर्शाता है की बुढा़पा एक अच्छा अनुभव भी हो सकता है ।