नई दिल्ली. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रमा के बाद अब मंगल गृह पर झंडा गाड़ने का लक्ष्य साधा है। इसरो ने बुधवार को बताया कि वह छह वर्ष के भीतर एक अंतरिक्ष यान मंगल में भेजना चाहता है, जिसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।
इसरो के चेयरमैन जी माधवन नायर ने बताया कि सरकार ने इस परियोजना के लिए दस करोड़ रुपए की आरंभिक राशि स्वीकृत कर दी है। इसका इस्तेमाल तमाम महत्वपूर्ण परीक्षणों, मिशन का मार्ग खोजने व अन्य जानकारियां एकत्र करने में किया जाएगा।
वैज्ञानिक प्रस्तावों पर काम : एस्ट्रोनॉटिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की एक कार्यशाला के दौरान माधवन ने बताया कि मिशन के लिए जरूरी अध्ययन पूरे कर लिए गए हैं। इस वक्त संगठन वैज्ञानिक प्रस्ताव एकत्र करने के प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि वे इस मिशन को 2013 से 2015 के बीच लांच करने की योजना पर काम कर रहे हैं।
युवा वैज्ञानिकों में उत्साह : उन्होंने कहा देश के पहले मानव रहित चांद मिशन ‘चंद्रयान-1’ ने युवा वैज्ञानिकों की कल्पनाओं को गति दे दी है। ये वैज्ञानिक बड़ी संख्या में अंतरिक्ष विज्ञान में अध्ययन के लिए आगे आ रहे हैं। इसरो इनकी प्रतिभा का उचित दोहन करना चाहता है।
जीएसएलवी का प्रयोग : विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के निदेशक के राधाकृष्णन ने बताया कि मंगल की ओर जाने वाले यान को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने के लिए जिओसिंक्रोनस सैटेलाइट लांच व्हीकल (जीएसएलवी) का इस्तेमाल किया जाएगा। उसे मंगल की ओर धकेलने के लिए लिक्विड इंजन या परमाणु ऊर्जा का प्रयोग किया जाएगा।
सौर ऊर्जा पर्याप्त नहीं : इसरो के सभी अंतरिक्ष यान सौर ऊर्जा से संचालित होते हैं, लेकिन मिशन की जरूरतों के मद्देनजर वैकल्पिक ऊर्जा तंत्र विकसित किया जा रहा है। इसरो सैटेलाइट सेंटर के निदेशक टीए एलेक्स ने बताया कि इस मिशन के लिए सौर ऊर्जा उपयुक्त नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग का क्या?: एलेक्स ने बताया कि अभी इस बात पर विचार चल रहा है कि इस मिशन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग लिया जाए या इसे घरेलू स्तर पर ही निपटाया जाए।
‘ओशनसैट-2’ का लांच जल्द : इसरो सितंबर मध्य तक ‘ओशनसैट-2’ सैटेलाइट लांच करने की योजना बना रहा है। यह सैटेलाइट पृथ्वी की गतिविधियों पर नजर रखेगी और उन्हें दर्ज करेगी। उसके संकेतों के आधार पर वैज्ञानिक मौसम की भविष्यवाणी कर सकेंगे। मछली पकड़ने की नई जगहों को चिन्हित किया जा सकेगा व तटीय क्षेत्रों का अध्ययन हो पाएगा। यह सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहले से स्थापित ‘ओशनसैट-1’ का उन्नत संस्करण है।
अमेरिका की अनुमति : अमेरिका ने भारत को टेक्नीकल सेफगार्ड एग्रीमेंट के तहत अल्जीरियाई सैटेलाइट लांच करने की अनुमति दे दी है।
इन सैटेलाइटों में अमेरिकी उपकरण लगे हुए हैं। इस समझौते के तहत अमेरिकी उपकरणों से लैस सैटेलाइटों को भारतीय लांच व्हीकल के माध्यम से अंतरिक्ष में भेजने का प्रावधान है। यह समझौता अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अपनी हाल की भारत यात्रा के दौरान (20 जुलाई को) किया था।
वजन 500 किलो
मंगल गृह पर जो अंतरिक्ष यान भेजा जा रहा है उसका वजन 500 किलो है। इसरो ने इसके प्रक्षेपण के लिए तीन लांच विंडोज का चयन किया है। इन्हें 2013, 2016 व 2018 में अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा।
अन्य योजनाएं
चंद्रयान-द्वितीय के अंतर्गत चांद पर रोबोट वर्ष 2012 में, अंतरिक्ष में इंसान 2015 तक , बेंगलुरू के निकट अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र बनाया जाना है, जो इस योजना के लिए चार सदस्यीय दल का चयन करेगा। यह दल सात दिन तक अंतरिक्ष में रहेगा।
यहां से लिए जा रहे वैज्ञानिक
इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी, द फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, अन्य रिसर्च लेबोरेट्री