भारतीय स्वतंत्रता का जो यज्ञ १८५७ में शुरू हुआ था, १५ अगस्त १९४७ तक उसकी ज्वाला को अविरत बनाए रखने में कई आहुतियों का योगदान है . ये आहुतियाँ भारत के हर क्षेत्र से आ रही थीं हिंदी साहित्य ने भी इस स्वातंत्र्य यज्ञ में महान भूमिका निभाई है . साहित्य ने स्वतंत्रता आन्दोलन को राह दिखाने से लेकर उसमे जोश भरने तक कई भूमिकाएं निभायीं हैं . स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पेश है आज़ादी के आन्दोलन के सापेक्ष हिंदी साहित्य का एक खास विश्लेषण-
राष्ट्रीयता की आरंभिक अभिव्यक्ति
भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन और आधुनिक भारतीय साहित्य की आधारशिला एक ही कालखंड में पड़ी . इससे ये बात और गहराई से समझा जा सकता है की आज़ादी के संघर्ष के दौर में हालात की ज़रूरत को भाँपते हुए हिंदी साहित्य ने ही सबसे पहले अपना काया कल्प किया और अपने आपको स्वतंत्रता की देवी को समर्पित किया . अंग्रेजी दासता के खिलाफ विद्रोह की जो पहली गूँज १८५७ में सुनाई दी उसकी पूर्वपीठिका १८५० के आसपास तैयार होने लगी थी. यही वक़्त हिंदी साहित्य के आधुनिक काल अथवा भारतेंदु युग के आरम्भ का भी है . इस युग का पूरा साहित्य अपनी परिस्थितियों की प्रतिक्रिया ही था आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत कई रचनाएं की. भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी जैसे उनके नाटकों में जहाँ भारत की तत्कालीन स्थिति पर सवाल था,वहीँ सत्य हरिश्चंद्र जैसे नाटक भारत की महान परंपरा का गौरवगान करते हैं . इस नाटक के प्रभाव से ही मोहन दास गाँधी , महात्मा गाँधी बने . राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले इस दौर के दुसरे प्रमुख साहित्यकारों में बद्री नारायण चौधरी, राधा चरण गोस्वामी और राधाकृष्ण दास आदि रहे . प्रेमघन की आनंद अरुणोदय और देश दशा जैसी कृतियों पर अंग्रेजों ने त्योरियां भी दिखायीं वही राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा ने राजनैतिक धार को तेज़ किया . हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता का स्वर अपने विराट रूप में द्विवेदी युग में दिखाई देता है परन्तु यह बात बिलकुल स्पष्ट है की भारतेंदु युग ने ही द्विवेदी युगीन राष्ट्रीयचेतना का पथ प्रशस्त किया .
विद्रोह का मुखर स्वर१८५० के आसपास हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता धरा प्रवाहित होने लगी थी और १९०० के बाद यानी पचास वर्षों के बाद ये राष्ट्रीयता का ये प्रवाह और तेज़ हो गया था. इस दौर में कविवर शंकर, कविवर मैथिलि शरण गुप्त ,माधव प्रसाद शुक्ल, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), जैसे प्रखर कवी हुए. मैथिलि शरण गुप्त में तो एक खास किस्म की पारंपरिक राष्ट्रीयता के चलते वे राष्ट्रकवि के रूप में विभूषित हुए. उनकी कृति भारत भारती स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी राष्ट्रीय रचनाओं में से एक है वहीँ इसी दौर में कविवर शंकर ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में 'प्राणों का बलिदान देष की वेदी पर करना होगा' जैसी तेजस्वी रचनाओं के ज़रिये आत्मोत्सर्ग के भाव में अभिवृद्धि की .
राष्ट्रीयता का रागात्मक स्वरुप
हिंदी साहित्य में छायावाद के दौर को सुक्ष्म मानवीय मनोवृत्तियों के चित्रण का दौर माना जाता है . इसी भाव के चलते इस दौर के प्रारंभिक काल में राष्ट्रीयता का स्वरुप भी रागात्मक ही रहा . जयशंकर प्रसाद की इस दौर की राष्ट्रीय रचनाएं हिंदी साहित्य की निधि मानी जाती हैं . हिमाद्री तुंग श्रृंग से, और अरुण यह मधुमय देश हमारा जैसी कविताएँ आज भी अविस्मरनीय है. प्रसाद के अलावा इसी रंग की अभिव्यक्ति निराला की भी रही .
समानान्तर राष्ट्रीय स्वर
बाद के वर्षों में छायावादी युग से ही एक विशुद्ध राष्ट्रीय धारा का जन्म हुआ जो छायावाद की स्वप्नशीलता के विरोध में उपजी थी, इसका काल प्रगतिवाद से पहले का है . इस धरा में माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सियाराम शरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, श्याम नारायण पाण्डेय, जैसे कवि आते हैं जिनकी अभिव्यक्ति सौम्य न होकर तेजस्वी थी. माखन लाल चतुर्वेदी को इस धरा का प्रणेता माना जा सकता है जबकि दिनकर इसके उत्कर्ष हैं . संपूर्ण हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता का जो रंग दीखता है वह इसी धारा के रंग से प्रभाव से बना है . इसी धारा ने ही प्रेमचंद जैसे गद्य लेखको को भी राष्ट्रीय अभिव्यक्ति के लिए प्ररित किया चतुर्वेदी जी ने ललकार शैली को जन्म दिया और कई बार अंग्रेजो का कोपभाजन बने वहीँ उनकी शैली को ही नवीन, दिनकर और उनसे भी रौद्र रूप में श्याम नारायण पाण्डेय आगे ले गए . दिनकर की हुंकार, रश्मिरथी, सामधेनी, और चतुर्वेदी जी की हिम किरीतनी, हिम तरंगिनी बहुत चर्चित हैं .सुभद्रा कुमारी चौहान तो झाँसी की रानी को अमर करके खुद भी अमर हो गयीं .उनकी रचना बुंदेले हरबोलों के मुह...बच्चों की जुबां पर है
राष्ट्रीय साहित्य के आयाम
हिंदी के राष्ट्रीय साहित्य में बड़ा हिस्सा हिंदी काव्य का है . इसका कारण यह है की स्वतंत्रता आन्दोलन को जिस तरह की त्वरित प्रभावी अभी व्यक्ति की ज़रूरत थी वह , काव्य से ही संभव थी. लेकिन गद्य में भी कम नहीं लिखा गया . प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रसाद, हरिऔध, वियोगी हरी ने गद्य में भी खूब राष्ट्रीय अभिव्यक्ति की, प्रेमचंद की सोजे वतन को तो अँगरेज़ सरकार ने जब्त भी कर लिया था .
कुल मिला कर हिंदी साहित्य ने अपनी विविध विधाओं के ज़रिये आज़ादी के आन्दोलन को न सिर्फ बल दिया बल्कि उसकी इतिश्री तक उसके सहभागी रहा . हिंदी साहित्य का राष्ट्रीय स्वर इस बात का प्रमाण है की साहित्य अपने समाज प्रेरित होता है और बाद में उस समाज की ही प्रेरणा बनता है