कविता और पाठक के आपसी संबंध पर पिछले लंबे अरसे से पंजाब में एक डिबेट चली आ रही है। बहुत सारे विद्वानों का इसके बारे में अलग-अलग मत है। फिर भी कुछेक कवियों का निजी अनुभव यह है कि अगर इंसान में संवेदनशीलता है, तो कविता कभी भी अपना अस्तित्व नहीं खो सकती..
ख़ूबसूरत किताबों से दोस्ती करो
इन्हें एकांत में पढ़ो
तुम देखना..
मन की बस्ती..
महक से भर जाएगी
नीरस-सी ज़िंदगी
रंगों से भर जाएगी..
इस लंबी न•म की कुछ लाइनें मेरी निजी डायरी के पहले पन्ने पर अंकित हैं। पूरी न•म पढ़कर मन को एक अजीब सुकून मिलता है। इस न•म का नाम है ‘किताब ही ज़िंदगी है’। यह न•म दिल्ली में रहती एक बहुत ही ज़हीन लड़की कंवल ने लिखकर भेजी थी। कंवल ने जिस ख़ूबसूरती से किताबों का ज़िक्र इस न•म में किया है, उसे पढ़कर कोई भी श़ख्स किताब से मोहब्बत किए बिना नहीं रह सकता। इस बात का मुझे पक्का यक़ीन है।
कंवल की यह कविता कई बार बहुत सारे सवाल लेकर भी मेरे सामने खड़ी हो जाती है। ये सवाल किताबों से जुड़े हुए ही होते हैं। कई प्रकाशकों का मानना है कि कविता की किताबें बहुत कम बिकती हैं। पंजाबी प्रकाशक भी और हिंदी प्रकाशक भी कविताओं की किताबें लेखकों से पैसे लेकर प्रकाशित कर रहे हैं और वो भी बहुत ही कम संख्या में। पंजाब में यह मुद्दा बहुत ही विचारनीय है कि आख़िर कविता को इस तरह से पाठकों की मान्यता क्यों नहीं मिल रही। इसमें बहुत सारे लोगों का कहना है कि कविता में से संगीतात्मकता का खो जाना इसका ज़िम्मेदार है।
साथ ही हम अगर ग़ज़ल की बात करते हैं, तो पाठक उसके भी बहुत कम नज़र आते हैं। फिर संगीतात्मकता वाली बात पीछे चली जाती है। आख़िर हम इस दौर को कैसे समझें। बहुत सारे लोगों का मानना है कि यह नॉवेल का दौर है। आधुनिक ज़िंदगी को जिस तरह से नॉवेल पकड़ रहा है, दूसरी विधाओं के मुक़ाबले उसे •यादा मान्यता मिल रही है। सारे संसार में नॉवेल के पाठक बढ़ रहे हैं।
ख़ैर, हम बात कविता की कर रहे थे। पिछले दिनों जब मैंने अपनी डायरी खोली, तो कंवल की वही लाइनें पढ़कर मेरे ज़हन में ‘किताबों और लड़कियों’ बारे एक याद ताज़ा होने लगी।
सर्दियों का एक ख़ूबसूरत दिन था। फिरोज़पुर में लड़कियों के कॉलेज कवि दरबार में शिरकत करने का सबब बना। उस कॉलेज की लड़कियां हर कवि की कविता को बहुत ही मोह से सुन रही थीं। उनका कवि को दाद देने का अपना एक अलग अंदाज़ था। कविताओं प्रति उनका यह प्यार देखकर मन को बहुत अच्छा लगा।
यह महसूस हुआ कि कविता कभी भी मर नहीं सकती और यह हर युग में अपना अस्तित्व क़ायम रखेगी। कॉलेज के ऑडीटोरियम में कविताओं का जादू चल रहा था। बाहर कई प्रकाशक पुस्तक प्रदर्शनियां लगाकर बैठे थे। अंदर कविता के फूल खिल रहे थे और बाहर क्लासिक किताबें अपना जलवा दिखा रही थीं। लड़कियां जिस अंदाज़ से कविताओं का आनंद ले रही थीं, उसी शिद्दत से अपनी पॉकेट मनी में से कुछ किताबें ख़रीद रही थीं।
कविताओं का जादू इस क़द्र हुआ कि समागम के बाद कॉलेज की लड़कियां बहुत अदब से कवियों से आटोग्राफ ले रही थीं। लड़कियों के इस कॉलेज में कवियों को मिल रहे इस प्यार को देखकर मेरे होंठों पर मुस्कुराहट आ गई। मुझे इस तरह मुस्कुराते देखकर तीन-चार लड़कियां बड़ी तेज़ी से मेरे पास आईं और उन्होंने अपनी-अपनी डायरियां मेरे आगे कर दीं। इससे पहले कि मैं उनकी डायरियों में कुछ लिखता, मनदीप नाम की एक लड़की आगे आई और बेझिझक बोली, ‘भाजी, कवि मुस्कुराते हुए भी कितने अच्छे लगते हैं?’ उसके इन बोलों से चारों तरफ़ हंसी के फूल खिल उठे।
फिरोज़पुर से लुधियाना वापस आते उन सभी लड़कियों के चेहरे आंखों के सामने घूमते रहे। कवियों, कविताओं और किताबों को इतना मोह करने वाली इन लड़कियों से मिलकर मन सचमुच महक से भर गया और भीतर से ख़ुद-ब-ख़ुद एक दुआ निकली- या ख़ुदा! ये कविताओं जैसी लड़कियां हमेशा हंसती-बसती रहें और ज़िंदगी भर किताबें से जुड़ी रहें। साथ ही एक शेर मेरे होंठों पर आ गया-
किताबां ते कुड़ियां तों
सखणो जो घर ने।
ओह घर काहदे घर ने,
ओह दर काहदे दर ने।