जन्म के तुरंत बाद बच्चे की पहली ज़रूरत होती है मां का दूध। यह न सिर्फ़ शिशु को सम्पूर्ण पोषण देता है और उसे कई बीमारियों से बचाता है, बल्कि मां को भी तंदुरुस्त बनाता है..
नियाभर में मां के दूध को बच्चे के लिए सबसे बढ़िया माना गया है। यह शिशु के लिए कुदरती आहार है, जिसका दूसरा कोई विकल्प नहीं है। नवजात बच्चे के लिए यह पोषण का सबसे बढ़िया स्रोत है। यह बच्चे को कई बीमारियों व इन्फैक्शंस से बचाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मां जब बच्चे को दूध पिलाती है, तब उन दोनों में भावनात्मक संबंध और अधिक मज़बूत हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नवजात शिशु को जन्म के एक घंटे के भीतर दूध पिलाना फ़ायदेमंद रहता है।
क्यों है ज़रूरी?- मां का दूध डिब्बाबंद दूध की अपेक्षा जल्दी हज़म हो जाता है। इसमें फैट, ग्लूकोज़, पानी और प्रोटीन संतुलित मात्रा में होते हैं। जो बच्चे के विकास के लिए ज़रूरी हैं। मां के दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन आसानी से पच जाता है, इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। मां का दूध पीने वाले बच्चे •यादा बुद्धिमान होते हैं, मोटापे का शिकार नहीं होते और उन्हें भविष्य में कई बीमारियों का ख़तरा भी कम होता है।
बोतल का दूध पीने वाले बच्चे विकास के लिए ज़रूरी पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं। जिन बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता, उनमें ब्रैस्ट फीड लेने वालों के मुक़ाबले मौत का ख़तरा २-७ गुना •यादा रहता है या गंभीर बीमारियों की संभावना बनी रहती है।
ये है फ़ायदा- ब्रैस्ट फीडिंग शिशु के लिए संरक्षण और संवर्धन का काम करती है। नए जन्मे बच्चे में रोग प्रतिरोधक शक्ति नहीं होती। मां के दूध से यह शक्ति शिशु को हासिल होती है। मां के दूध में लैक्टोफोर्मिन नामक तžव होता है, जो बच्चे की आंत में लौह तžव (आयरन) को बांध लेता है। आयरन के कारण शिशु की आंत में रोगाणु पनप नहीं पाते। मां के दूध से आए साधारण जीवाणु बच्चे की आंत में पनपते हैं और रोगाणुओं से प्रतिस्पर्धा कर उन्हें पनपने नहीं देते।
वातावरण से मां की आंत में पहुंचे रोगाणु, आंत में स्थित विशेष भाग के संपर्क में आते हैं, जो उन रोगाणु-विशेष के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक तत्व बनाते हैं। ये तत्व एक विशेष नलिका थोरासिक डक्ट से सीधे मां के स्तन तक पहुंचते हैं और दूध से बच्चे के पेट में। इस तरह मां का दूध पीकर बच्च हमेशा स्वस्थ रहता है।
मां की तंदुरुस्ती का राज़- एक अध्ययन के अनुसार जो महिला अपने बच्चे को दूध पिलाती है, उसके शरीर में ४क्क्-६क्क् कैलोरी अतिरिक्त खर्च होती है। इससे प्रेगनेंसी के दौरान शरीर पर चढ़ी अतिरिक्त फैट कम हो जाती है। वह दोबारा पतली हो जाती है। यूट्रस भी अपने वास्तविक आकार में आ जाता है। डिलीवरी के बाद होने वाली ब्लीडिंग भी कम होती है। ब्रैस्ट व यूट्रस कैंसर होने का ख़तरा भी कम हो जाता है।
ये है ख़तरा- जिन बच्चों को बचपन में पर्याप्त रूप से मां का दूध पीने को नहीं मिलता, उनमें टाइप-टू डायबिटीज़ होने की संभावना अधिक होती है। उनमें बुद्धि विकास अपेक्षाकृत कम होता है। अगर बच्चा समय पूर्व जन्मा (प्रीमेच्योर) हो, तो उसे बड़ी आंत का घातक रोग, नेक्रोटाइजिंग एंटोरोकोलाइटिस हो सकता है। अगर गाय का दूध पीतल के बर्तन में उबाल कर दिया गया हो, तो शिशु को लीवर का रोग ‘इंडियन चाइल्डहुड सिरोसिस’ हो सकता है।
कब पिलाएं दूध- जन्म के तुरंत बाद बच्चे को मां का दूध देने की कोशिश करनी चाहिए। यदि नॉर्मल डिलीवरी हो, तो आधे घंटे बाद और यदि सिज़ेरियन हो, तो दो घंटे बाद बच्चे को फीड दी जानी चाहिए। जब भी बच्च रोता है, तब कुछ मांएं तुरंत उन्हें दूध पिलाना शुरू कर देती हैं, पर बच्चे को दो घंटे के बाद ही दूध पिलाएं। बच्चे को दिनभर में ग्यारह-बारह बार दूध पिलाना चाहिए।
कुछ बच्चे धीरे-धीरे दूध पीते हैं, तो कुछ जल्दी ही पी लेते हैं, इसलिए बच्चे को तब तक दूध पिलाएं, जब तक कि उसका पेट भर न जाए। कई बार मांएं जल्दी दूध छुड़वा लेती हैं, पर तब तक बच्चे का पेट नहीं भरा होता।
फीड ही प्र्याप्त है- बच्चे को चार महीने की उम्र तक मां के दूध के अलावा कुछ भी देने की ज़रूरत नहीं होती। जो बच्चे केवल मदर फीड लेते हैं और बोतल का दूध नहीं पीते, उन्हें इस दौरान पानी की भी आवश्यकता नहीं होती। उन्हें मां के दूध से ही पूरा पोषण मिल जाता है।
मिथ- कई लोगों में यह धारणा है कि पहले दो-तीन दिन मां को जो दूध आता है, वह बच्चे को नहीं पिलाना चाहिए। यह धारणा ग़लत है। इस गाढ़े व पीले रंग के दूध को कोलेस्ट्रॉम कहते हैं। यह बच्चे के लिए बहुत फ़ायदेमंद है, क्योंकि इसमें प्रोटींस, एनर्जी और प्रोटैक्टिव एंटी बॉडिज़ होते हैं, जो बच्चे को कई बीमारियों से बचाते हैं। जन्म के समय कोलेस्ट्रॉम की एक-एक बूंद आंख में डाल दें, तो कुछ बैक्टीरिया आंखों में होते ही नहीं। लेकिन ऐसा सिर्फ़ एक ही बार करें।
-डॉ. फुलिंदर प्रीत, चाइल्ड स्पैशलिस्ट