2009 के अफगानिस्तानी चुनाव में इस बार 41 उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार हैं। उम्मीदवारों में अफगानिस्तान की कुछ जानी - मानी हसतियां है, कुछ नए लोग, कुछ तालिबान समर्थक, कुछ जिहादी समर्थक और कुछ पूर्व साम्यवादी भी शामिल हैं। आइए इनमें से कुछ को करीब से जाने:
1. उम्मीदवारों की सूची में सबसे पहला नाम है वर्त्तमान राष्ट्रपति हामिद करजई का, जिन्होंने दिसम्बर 2001 में तालिबान के पतन के बाद अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार का कार्यभार संभाला था और तीन साल बाद 55 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाकर करजई ने चुनाव जीता। इस बार के चुनाव में वे एक मज़बूत प्रत्याशी हैं। उनका कहना है कि अगर वे सत्ता में वापस लौटे तो अपनी सरकार की सामाजिक और वित्तीय मुद्दों पर पाई उपलब्धियों को और बढ़ावा देगें। अपने चुनाव अभियान में उन्होंने अपनी सरकार की मानवाधिकार और महिलाओं के अधिकार के लिए किए गए काम तथा आधार भूत सुविधाओं के विकास को मुख्य बिंदु बनाया है। वे अपने मुल्क पर हवाई हमलों की निंदा करते हैं जिसमें हज़ारों लोगों की जानें गई हैं।
2. अब्दुल्ला अब्दुल्ला संयुक्त राष्ट्रिय विपक्षी दल (यूनाइटेड नेशनल फ्रंट ओपोजिशन एलाएंस) का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्हें करजई का मुख्य प्रतिद्वंदी माना जा रहा है। वे एकमात्र ऐसे प्रत्याशी हैं जो स्वतंत्र रूप से नहीं खड़े हैं। 2006 तक वे अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार की विदेश मंत्रालय में कार्यरत थे। उन्होंने भ्रष्टाचार कम करने और अंतरराष्ट्रीय सैन्य बलों की मदद से विद्रोही गुटों के खिलाफ लडा़ई जारी रखने का वायदा किया है। वे तालिबानी नेता मुल्लाह ओमार और हेज्ब-ए-इस्लामी नामक विद्रोही गुट के नेता गुलबुद्दीन हेक्मात्यार के अलावा अन्य तालिबानियों से बातचीत करने के लिए तैयार हैं और उन सभी विद्रोही गुटों से भी जो हथियार डालने को राजी़ हैं।
3. 60 वर्षीय अशरफ घानी अह्मद्जई एक स्वतंत्र प्रत्याशी हैं जिन्होंने अफगानिस्तान के पुनर्निमाण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। घानी वर्ष 2002 से 2004 के बीच अफगानिस्तान के वित्त मंत्री रह चुके हैं और काबुल विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर भी काम कर चुके हैं। वे मानव शास्त्र के जाने माने विद्वान हैं और विश्व बैंक में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत भी रह चुके हैं। उनका जन्म काबुल में हुआ था और वे पश्तून समुदाय के सदस्य है। घानी ने अफगानिस्तान के विकास में अवरोध करने वाले तत्वों की एक सूची बनाई है जिसमें अल- काएदा, देश के विद्रोही गुट, नशीली दवाइयां, कमज़ोर शासन प्रणाली और भ्रष्टाचार को शामिल किया है।
4. बड़बोलेपन की छवि रखने वाले रमजान बशरदोस्त एक अन्य स्वतंत्र उम्मीदवार हैं। अपने वक्तव्यों में गरीबों को समर्थन देने के कारण वे आम जनता में काफी लोकप्रिय भी हैं। वे हजारा समुदाय के सदस्य हैं। उन्होंने फ्रांस में कुटिल नीति की पढ़ाई की और मार्च 2004 में उन्हें योजना मंत्रालय का मंत्री बनाया गया लेकिन सरकार द्वारा 2000 अफगान और अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनो को गैरकानूनी घोषित करने के फैसले के विरोध मे दिसम्बर 2004 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 2005 के संसदीय चुनाव में वे सफल रहे थे।
5. अब्दुल जबार साबित अफगानिस्तान के पूर्व महान्यायवादी (अटोर्नी जनरल) और सरकार के कानूनी सलाहाकार रह चुके हैं। उन्हें हेज्ब-ए-इस्लामी नामक विद्रोही गुट के नेता गुलबुद्दीन हेक्मात्यार से संबंधो के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने काबुल के रेस्तरां और चीनी वेश्यालयों पर हमलों का नेतृत्व किया है। उन्होंने शराब की बिक्री पर प्रतिबधं लगाने के लिए भी काम किया है। उनका दावा था कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ पवित्र लड़ाई लड़ रहे थे। राष्ट्रपति करजई से उनके रिश्तो में तब खटास आ गई जब उन पर धोखाधड़ी का इल्जाम लगाया गया। अब उन पर सरकार द्वारा यात्रा करने पर प्रतिबंध है।
6. मुल्लाह रोक्केती जाबुल क्षेत्र से अफगानिस्तान संसद में कार्यरत हैं। तालिबान के पतन के बाद अमरीकी सरकार ने कुछ समय के लिए उन्हें जेल में रखा था।
7. अफगानिस्तान के संसद के निचले सदन के अध्यक्ष मिर्वैस यसिनी भी इस चुनाव में राष्ट्रपति पद के दावेदार है। सोविएत आक्रमण का विरोध करने में यसिनी ने मुख्य भूमिका निभाई थी फिर 1993 से 2001 तक तालिबान के विरोध में भी सक्रिय रहे। तालिबान के पतन के बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय के लिए काम किया और काउंटर नारकोटिक्स विभाग के निदेशक भी रहे है।
8. शाहनवाज़ तनाई 1980 के दशक में अफगानिस्तान सेना के प्रमुख थे । उन्होंने राष्ट्रपति मोहम्मद नज़ीबुल्लाह के दौर में सत्तापलट की भी कोशिश की थी लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो पाए और उन्होंने पकिस्तान में शरण ली। फिलहाल वे अफगानिस्तान पीस मूवमेंट के नेता हैं और अफगानिस्तान के लिए अमरीकी नीतियों का पुरजोर विरोध करते है।
9. अब्दुल हसीब आर्यन पिछले चुनाव में वर्त्तमान राष्ट्रपति करजई से काफी पीछे रह गए थे। उन्हें पुलिस में एक वरिष्ठ पद पर नियुक्त किया गया था। उनका कहना है कि ज़्यादातर उम्मीदवार चुनाव इसलिए लड़ रहे हैं ताकि उन्हें प्रसिद्धि और राजनितिक विशेषाधिकार मिल सके।
10. फरोजां फ़ना एक महिला उम्मीदवार हैं और कहती हैं कि अगर वे सत्ता में आईं तो महिलाओं के लिए ज़्यादा नौकरियां लेकर आएंगी। उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए उन आरोपों का खंडन किया है जिसके अनुसार चुनाव अभियान के लिए उनकी तस्वीरो के इस्तेमाल पर उन्हें आपत्ति है।
11. शहला अत्ता दूसरी महिला उम्मीदवार हैं। वे महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ना चाहती हैं। उनके चुनाव अभियान का नारा कुछ इस प्रकार है " औरतें समाज का आधा हिस्सा हैं"। वे कहती हैं कि सत्ता में आते ही वे उपेक्षित महिलाओं के लिए काम करना चाहती हैं।