Dharm Darshan
बुद्धि से प्रवेश करें और प्रज्ञा से गहरे उतरें
पं. विजयशंकर मेहता Saturday, August 22, 2009 10:30 [IST]  

धर्म के अनेक नाम रख दिए जाएं परंतु उसके भीतर का सत्य एक ही रहेगा। इस सत्य को केवल बुद्धिमान होकर नहीं पाया जा सकता। हां, संसार को आसानी से पाया जा सकता है, यदि हम बुद्धिमान हैं तो। अफसोस है कि आज के दौर में बुद्धिमानी का उपयोग स्वयं को आगे बढ़ाने और दूसरों को पछाड़ने में ही किया जा रहा है। इस काल में बुद्धिमान लोग षड्यंत्र, भ्रष्टाचार, शोषण व दमन की ओर बढ़े पर सत्य की ओर नहीं चले।



सत्य की खोज तब शुरू होती है, जब बुद्धि प्रज्ञा में बदलती है। बुद्धि जब परिष्कृत हो जाए, तब प्रज्ञा कहलाती है। आत्मज्ञान की ओर बढ़ती बुद्धि को प्रज्ञा कहते हैं। इसलिए प्रयास हो कि बुद्धि से प्रज्ञा और प्रज्ञा से सत्य हाथ में आए। हिंदू शास्त्रों ने यह घोषणा बार-बार की है। इसको इस्लाम ने भी कबूल किया है। हजरत मुहम्मद पर रोशन किताब कुरान में यह आयत उतरी है। जरा इस अजीम दुआ को पढ़ें - व कुरब्बी जिदनी इल्मन-ऐ-परवर दिगार मेरा इल्म और बढ़ा।



इल्म बढ़ाने की बात वही है कि बुद्धि से प्रज्ञा की ओर जाना, वरना सत्य कैसे हाथ लगेगा। इबादत के दूसरे मायने हैं सच को पकड़ लेना। सत्य पाने के दो तरीके हैं- शास्त्र पढ़ें या सत्संग सुनें। पढ़ना ही नहीं, जब सुनें भी तो गहराई से। बौद्ध व जैन धर्म ने एक शब्द दिया है श्रावक जिसका अर्थ है जिन्होंने संतों को श्रवण किया है।



श्रोता और श्रावक होने में फर्क है जिन्होंने कान से सुना वे श्रोता और जो प्राण से सुनते हैं वे श्रावक। इस स्थिति में बुद्धि प्रज्ञा की ओर बढ़ती है। प्रज्ञा पाने का एक सरल तरीका है जरा मुस्कराइए..।

Bookmark and Share


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: