मूल लेखक - श्री यामिनीकांत सोम, हिंदी अनुवाद उत्पल बैनर्जी
कई योजन तक घना जंगल फैला हुआ था। उस जंगल में साल के बड़े-बड़े वृक्ष, ऊंचे-ऊंचे देवदार, रंग-बिरंगे तमाम फूलों और जाने कितने अच्छे-अच्छे फलों के पेड़ थे। एक सिंह इस बड़े जंगल का राजा था। पशुराज जितना वीर था, उतना ही घमंडी भी था। घमंडी भला क्यों न होता, इतने सारे जानवर.., लंबे-तगड़े भालुओं से लेकर बंदर, गिलहरी तक सभी पशुराज के अधीन थे, सभी उनके आज्ञाकारी थे। केवल गजराज ही थे, जो ऐंठे हुए थे। लेकिन उनके बीच हुई तीन-तीन लड़ाइयों में पशुराज सिंह ने उन्हें ऐसा हराया था कि आखिर में हाथी के लिए सिंह की अधीनता स्वीकार करने के अलावा कोई उपाय शेष नहीं बचा। आदेश हुआ कि आज गजराज को दरबार में हाÊिार होना होगा और बाकायदा झुककर सलाम करना होगा। खरगोश सिंहराज का अंगरक्षक था। बकरी की पीठ पर नगाड़ा बांधकर वह जंगलभर में ढिंढोरा पीट आया कि दरबार वाले दिन सभी जानवरों को हाÊिार होना होगा। जो हाÊिार नहीं होगा, उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी जाएगी।
पशुराज के हुक्म को न माने, भला किसमें ऐसी हिम्मत थी। सभी हाÊिार हुए। हिरण, गिलहरी, बंदर, कोई भी अनपुस्थित नहीं था। ऊंचे-ऊंचे तीन साल के पेड़ों तले दरबार लगा था। अपनी अयाल (शेर के गर्दन के झबरीले बाल) फुलाकर सिंहराज सिंहासन पर विराजमान थे। उनके शरीर पर राजपोषाक थी, सिर पर मुकुट और हाथ में राजदंड। महारानी सिंहनी उनके पास में बैठी थी, उनका पहनावा रानियों-जैसा था। बाघ उनका छत्रधारी था। वह उनके पीछे एक बड़ा-सा छत्र (छतरी) पकड़कर मूंछें फुलाकर खड़ा था। शांति और सुरक्षा की व्यवस्था भालू के जिम्मे थी। सिर पर एक बड़ी-सी पगड़ी बांधे, हाथ में एक मोटी-सी लाठी लेकर चहलकदमी करते हुए वे दरबार की शांति-व्यवस्था कायम किए हुए थे। भेड़िया सेनापति था। लाल कुर्ते पर म्यान में तलवार खोंसे वह सिंहराज के हुक्म की प्रतीक्षा में खड़ा था। दरबार में लोगों की भारी भीड़ थी।
सब चुपचाप थे कि अचानक पेड़ों पर बैठे बंदर किचकिच कर उठे और एक डाल से दूसरी डाल पर उछलकूद करने लगे। तभी अंगरक्षक खरगोश कंधे पर लाल झंडा लिए तीर की गति से दौड़ता हुआ आया और सूचना दी कि गजराज आ रहे हैं। तुरंत सेनापति के आदेश पर सारे जानवर एक कतार में खड़े हो गए। गजराज अपना भीमकाय शरीर लिए झूमते हुए चले आ रहे थे। उन्हें सिंहराज के दो दूत जेब्रा अपनी अगवानी में लिए आ रहे थे। गजराज ने इधर-उधर कहीं भी नहीं देखा और सीधे सिंह के सामने जाकर खड़े हो गए। फिर सूंड उठाकर तीन बार सलाम किया और आखिरी सलाम के समय दूत के इशारे पर घुटनों पर बैठकर उन्होंने सिंह की अधीनता स्वीकार करने का संकेत दे दिया।
तुरंत सिंहराज के इशारे पर भेड़िए ने आकर गजराज के गले में कनेर के फूलों की माला डाल दी और सिंहराज ने खुद हाथी के माथे को अपने राजदंड से छुआ और उन्हें अपना मंत्री नियुक्त की घोषणा कर डाली। ऐसा करते ही पीछे खड़े छत्रधारी बाघ ने एक Êाोरदार हुंकार भरी और उसके साथ ही साथ भालू, Êोब्रा, भेड़िए जैसे अधिकारियों ने सभी को कंपा देने वाला जयकारा लगाया। जयकारे जब खत्म हुए, तो पेड़ों की टहनियों पर बंदरों ने किचकिच और नीचे सियारों ने ‘हुआ-हुआ’ करते हुए अपनी संगीतसभा शुरू कर दी। तय हुआ था कि सियारों का मुखिया ‘रता सियार’ अपने दल-बल के साथ आज तमाशा दिखाएगा। दल के और सारे लोग तो आ गए थे। केवल रता सियार अनुपस्थित था।
‘रता नहीं आया! रता नहीं आया!’ अपनी भृकुटी तानकर आंखें गोल-गोल कर सिंहराज ने हुंकार लगाई, ‘क्या, ऐसी हिमाकत! मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया!’ तुरंत हुक्म हुआ, ‘जाओ, अभी, इसी वक्त, वह जहां भी मिले बांधकर ले आओ।’ रता सियार का मौसेरा भाई था, खेंकी (गुस्सैल) सियार। खेंकी सिंहराज के तोशकखाने (अमीरों के वस्त्र, Êोवर आदि रखने का स्थान) का दीवान था। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘हुÊाूर, रता का पेट गड़बड़ा गया है, इसीलिए शायद वह नहीं आया।’ सेनापति भेड़िए ने एक लंबा सलाम ठोंकते हुए कहा, ‘पेट की गड़बड़ी वगैरह सब झूठ बात है जनाब! असल में रता सियार ने भीतर-भीतर ऐसी हरकतें कर डाली हैं कि हुÊाूर के सामने आने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही।’
सिंहराज ने हुंकार भरी। बोले, ‘क्या-क्या हरकतें की हैं उसने?’ ‘भयानक-भयानक हरकतें हुÊाूर! तो फिर सुनिए।’ ऐसा कहकर भेड़िए ने बताना शुरू किया-
‘गजराज के साथ जब हुÊाूर की लड़ाई चल रही थी, मैं भी तब आपके साथ गया था। घर में मेरी पत्नी हमारे छोटे-छोटे बच्चों के साथ थी। वह एक दिन शाम को नदी किनारे टहलने गई, ऐसे में इस पाजी ने क्या किया कि मेरे छोटे-छोटे बच्चों को ऐसा नोंचा-खसोटा कि मैं क्या बताऊं! किसी का कान काट खाया, किसी के पैर चबा डाले, एक के चेहरे और आंखों को ऐसी खरोंचें मारीं कि वह जीवनभर के लिए अंधा हो गया। इस अत्याचार पर न्याय कीजिए हुÊाूर! मुझे तो सरकारी काम से अधिकतर बाहर ही रहना होता है।’
भेड़िए की बात खत्म होते न होते ही अंगरक्षक खरगोश का छोटा भाई छलांग लगाता हुआ आया और हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘महाराज, मेरी भी एक शिकायत है। मैं एक दिन झाड़ियों में चुपचाप बैठकर गधे भइया का गाना सुन रहा था, ऐसे में रता सियार जाने कहां से आ टपका और बोला, ‘तू ये क्या खाक गाना गा रहा है! मैं उस्ताद हूं, मुझे बहुत अच्छा गाना आता है। तुझे सीखना हो, तो बोल, तुझे अभी सिखा देता हूं।’ मैंने कहा, ‘बहुत अच्छा, तो फिर सिखा दो।’ तब उसने मुझसे आलथी-पालथी मारकर बैठने के लिए कहा। उसके कहे अनुसार मैं जैसे ही बैठा, वैसे ही उसने किया क्या कि एक झटके में मेरी गर्दन पकड़ ली और Êाोर-Êाोर से हिलाने लगा। खुशकिस्मती से गधे भइया वहीं थे, उन्होंने गाना रोककर दोनों पैरों से रता के पेट में एक Êाोरदार लात मार दी। तब जाकर कहीं उसने मुझे छोड़ा और कराहते-कराहते वहां से रफू-चक्कर हो गया। गधे भइया नहीं होते, तो उस दिन रता सियार के हाथों मेरी मौत हो जाती।’
खरगोश की बात खत्म होते न होते ही एक काले कुत्ते ने आगे बढ़कर कहा, ‘धर्मावतार, मेरी फरियाद भी सुनी जाए। बहुत दिनों तक बुखार में तपते हुए मेरी भूख मर गई थी। एक दिन बड़ी मुश्किल से मैं तली हुई मछली का कुरकुरा टुकड़ा जुगाड़कर झाड़ियों के पास बैठकर खाने के लिए मुंह में रखने ही जा रहा था कि पता नहीं रता सियार कहां छुपकर बैठा था, उसने एक छलांग लगाई और मेरे मुंह से मछली का टुकड़ा छीनकर भाग गया। मुंह से निवाला छीन लेना, .. अब आप ही बताइए यह कितना बड़ा अपराध है!’
भेड़िए ने गरजते हुए कहा, ‘खुदाबंद! इन तमाम अत्याचारों पर आप सुनवाई कीजिए।’
सिंहराज ने आंखें लाल-लाल करते हुए खूब Êाोर से अयाल हिलाई। हुंकारते हुए बोले, ‘मुझे रता सियार की गर्दन चाहिए, अभी, इसी वक्त! कौन लाएगा?’
खेंकी ने देखा कि यह तो भारी मुसीबत हो गई है! वह परेशान हो उठा, ‘आप अन्याय मत कीजिएगा हूजूर! मैं अपने बड़े भाई को बहुत अच्छी तरह जानता हूं। सालों हो गए उसने मांस-वांस खाना छोड़ दिया है। शिकार के लिए तो वह अब निकलता ही नहीं। कुत्ते ने जो बातें कहीं, वे सारी झूठी हैं। उससे पूछिए तो जनाब, तली हुई मछली का टुकड़ा उसे कहां से मिला? मैं ताल ठोककर कह सकता हूं कि वह उसे चुराकर लाया था! कुत्तों जैसी छोटी नÊार किसी और की हो सकती है क्या जनाब!’
सबकी नाक में दम कर देने वाले रता सियार को पकड़कर क्या राजा के दरबार में पेश किया गया? और राजा ने उसे कड़ी समझाईश भी दी.....