Dharm Darshan
मंगलकर्ता श्रीगणेश
भास्कर नेटवर्क Saturday, August 22, 2009 13:33 [IST]  

ganeshसभी मांगलिक कार्य करने से पहले सर्वप्रथम गणेश पूजन करना आवश्यक माना जाता है। गणेश जी विधनहर्ता हैं। वह समस्त बाधाओं का शमन करने वाले हैं और कृपा के सागर हैं..



गणपति जी समूचे ब्रह्मांड में वंदनीय हैं। अंत: जगवंदन हैं। वह कृपा के सागर हैं। भगवान गणेश सत, रज, और तम तीनों गुणों के ईश हैं। गुणों का ईश ही प्रणव स्वरूप ‘ú’ है। अत: प्रणव स्वरूप ओंकार ही भगवान की मूर्ति हैं, जो वेदमंत्रों के प्रारंभ में प्रतिष्ठित हंै। ऊंकार रूपी भगवान को ही गणेश कहा गया है। इस एकाक्षर में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तिष्क, नीचे का भाग उदर, चंद्र बिंदू लड्डू तथा मात्रा सूंड है। मध्य काल से पहले गाणपत्य नाम का तांत्रिक संप्रदाय था, जो शक्ति की उपासना करता था। शिव की तरह उस काल में गणोश पूजन भी लिंग रूप में ही की जाती थी। वह लाल रंग का होता था।




गणेश अवतार कब हुआ



गणोश जी आदि देव हैं। वह सृष्टि से पहले भी थे। उनका जन्म हर युग में होता रहा है। मुद्रल पुराण के अनुसार गणेश जी लोभासुर का संहार करने के लिए गजानन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्रोदय के समय अवतरित हुए। गणोश पुराण के अनुसार देवी के 12 वर्षो के तप के प्रताप से गणादि देव गणेश पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। उनके अवतरण समय पूर्वी क्षितिज पर सिंह लग्न उदित थे। चंद्रमा भी स्वाति नक्षत्र में भ्रमण कर रहे थे।



धर्मशास्त्रों के अनुसार माता पार्वति ने अपने तन पर लगी उबटन की मैल से एक पुतला बनाकर उसमें प्राण डाल दिए थे। यही बालक बाद में श्रीगणेश के नाम से विख्यात हुए।



मातृभक्त गणेश



गणोश जी का अपनी माता पार्वति से विशेष स्नेह करते हैं। उनकी आज्ञा को वह सवरेपरि मानते हैं। जब गणोश जी का अवतरण हुआ, तो माता पार्वति ने उन्हें अपने भवन के द्वार पर चौकसी के लिए तैनात करते हुए कहा-‘पुत्र मैं नहाने जा रहीं हूं। अत: किसी को भी भवन में प्रवेश मत करने देना।’ माता की आज्ञा का पालन करने के लिए गणोश जी ने किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया। कहते हैं उन्होंने भगवान शिव को भी द्वार पर ही रोक दिया। फलस्वरूप गणेश व शिव गणों में भयंकर युद्ध हुआ।



इसी दौरान परशुराम जी ने अपने फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दांत तोड़ दिया। परंतु गणोश जी ने अपने पराक्रम से समस्त शिवगणों को परास्त कर दिया। शिवगणों की हार से शिव ने स्वयं त्रिशूल से गणेश जी का मस्तिष्क काट दिया।



उनके सिर को बाद में हाथी का सिर लगा कर जोड़ा गया। इसके बावजूद श्रीगणेश माता की आज्ञा पालन में पीछे नहीं हटे। अत: जो प्राणी जीवन में गणेश जी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें अपनी माता की सेवा करनी चाहिए। माता की सेवा करने वालों पर श्री गणेश शीघ्र कृपा करते हैं। धर्मशास्त्रों में इसी लिए माता की सेवा कर आशीर्वाद प्राप्त करने का विस्तार से विवेचन किया गया है।



लेखक गणेश



जब महषि वेदव्यास ने ब्रrा जी की आज्ञा से वेदों को लिपिबद्ध करने का कार्य प्रारंभ किया, तो एक समस्या खड़ी हो गई। वेद-व्यास जी बिना रुके लगातार प्रवचन करते जाते। अत: इतनी गति से कोई भी वेदों को लिपिबद्ध नहीं कर पा रहा था। तब वेदव्यास जी ने गणोश जी का स्मरण किया। गणेश जी तुरंत प्रकट हुए और महर्षि का आग्रह स्वीकार किया। गणेश जी ने महाभारत, श्रीमद्भगवत गीता सहित वेदों को लिपिबद्ध
किया। गणेश जी तीव्र बुद्धि के स्वामी हैं। उन्होंने महर्षि वेदव्यास के बोलने की गति के साथ-साथ बिना रुके सारा लेखन कार्य संपन्न किया।




गणेश वाहन मूषक ही क्यों



प्राचीन काल में समेरू पर्वत पर सौमरि ऋषि का उत्पन्त मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती तथा पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषिवर लकड़ी लेने के लिए वन में गए। मनोमयी गृहकार्य में व्यस्त हो गईं। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहां आया। जब कौंच ने लावव्यमयी मनोमयी को देखा, तो व्याकुल हो गया। कौंच ने ऋषि पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती व कांपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख मांगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए।



उन्हें गंधर्व को श्राप देते हुए कहा, ‘तुमने चोर की भांति मेरी सहधर्मिनी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तुम मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरोगे।’
ऋषि का श्राप सुनकर गंधर्व ने ऋषि से प्रार्थना की- ‘हे ऋषिवर, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया। मुझे क्षमा कर दें।’
ऋषि बोले- ‘कौंच! मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा। तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति देव गजरूप में प्रकट होंगे। तब तुम उनका वाहन बन जाओगे। इससे तुम्हारा कल्याण होगा तथा देवगण भी तुम्हारा सम्मान करेंगे।’




ज्योतिष और गणेश



ज्योतिष शास्त्रों में गणोश पूजा को बहुत महत्व दिया गया है। गणेश जी की पूजा करने से समस्त ग्रह बाधा का शमन होता है। जीवन ख़ुशियों से भर जाता है। गणेश सूर्य के समान तेजस्वी है। उनकी आराधना से रोगों का शमन होता है व तेज़ में वृद्धि होती है। गणेश जी चंद्रमा जैसी शांति व शीतलता के प्रतीक हैं। चंद्रमा माता स्वरूप है। अत: गणेश पूजन से मातृसुख व शांति मिलती है।



गणेश जी मंगल के समान ही बलशाली हैं। गणेश पूजन से बल व पद प्रतिष्ठा मिलती है। गणेश जी संकटहर्ता हैं। अत: गुरु के प्रिय हैं। बुद्धि-विवेक के अधिष्ठा होने से बुध के देव हैं। इसी प्रकार धन, ऐश्वर्य, पुत्र के प्रदान करने वाले होने से शुक्र के अधिपति हैं। गणेश जी शिव पुत्र हैं। अत: शनि से इनका अत्यन्त स्नेह है। शिव शनि के गुरु हैं। हाथी पुरुष शरीर युक्त होने से राहू व केतू की शांति के भी देव हैं। यानी नवग्रह शांति मात्र गणेश स्मरण से ही हो जाती है।



- पं. आरके शर्मा

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