कहानी - मैं एश्वर्या नहीं बनूंगी
भास्कर नेटवर्क Saturday, August 22, 2009 14:26 [IST]  

बबिता मेरे घरेलू कामों में मददगार है। उसके काम में सफ़ाई और तरतीब की कमी है। स्वभाव की तीख़ी होने के कारण बर्तनों और फर्नीचर की तोड़-फोड़ •यादा करती है। उसकी ठाह-ठूह से मेरी सोच-प्रक्रिया को बहुत झटके लगते हैं। फिर भी मैं बबिता को बर्दाशत करती रहती हूं। इसका कारण है उसकी व़क्त की पाबंदी और बहानों की कमी। वह सुबह ठीक साढ़े आठ बजे हाज़िर हो जाती है और दस बजे चली जाती है। चाय का बिल्कुल शौक नहीं। न ही तऩख्वाह के अलावा किसी और चीज़ पर आंख रखती है। बबिता को बर्दाशत करना कोई आसान काम नहीं। पता नहीं किस व़क्त वह अनाप-शनाप बोलने लगे। आपको बहुत •यादा ग़ुस्सा भी आ सकता है।



दो दिन पहले पोचा लगाते बबिता ने कुर्सी को इतने ज़ोर से धक्का दिया कि कुर्सी फ्रिज से टकराकर गिर पड़ी। फ्रिज के दरवाज़े का पेंट उतर गया। बड़ा-सा निशान पड़ गया। ‘दिखाई नहीं देता तुझे?’ मैंने ग़ुस्से में आकर कहा। अपनी ग़लती मानने की जगह वह बोली, ‘रात क्या खाया था आपने, जो गर्जने की इतनी ताकत आ गई?’ बहुत बार दिल में आया है कि बबिता को निकालकर कोई दूसरी काम वाली रख लूं, पर नहीं कर पाई। शायद मुझे उसकी आदत हो गई है। विवाह और फिर बेटे को जन्म देने के बाद बबिता ने सिर्फ़ मेरा काम ही पकड़ा है। उसका बेटा नीरज दो साल का है।



मज़े की बात है कि बबिता अपना ज़िक्र पुलिंग संबोधन से करती है। जैसे, ‘मैं आ गया। मैं जाता हूं। वगैरह-वगैरह!’ मुंबई में रिहायश दौरान मराठी स्त्रियों के ऐसे लहज़े की मुझे आदत थी। अंग्रेज़ी की तरह मराठी ज़बान में भी स्त्री-लिंगी संबोधन मनफ़ी है। पर पंजाबण बबिता का यह मुहावरा मुझे अजीब लगता है। वह कहती है कि भाईयों और भतीजों में पली-बढ़ी होने के कारण वह इस तरह बोलने की आदी हो गई। ‘और ससुराल वाले तुझे ऐसा करने से नहीं रोकते?’ मेरे पूछने पर बबिता का जवाब होता, ‘नहीं। मेरी सगाई के व़क्त ही बापू ने कह दिया था कि बबिता इसी तरह बोलता है। आपको सहन करना पड़ेगा। वैसे भी वे कौन होते हैं मेरी आदत बदलने वाले? मैं तो इसी तरह बोलता हूं और इसी तरह बोलूंगा।’ मैं हंस पड़ती।



मेरे घर का काम निपटाकर बबिता घर की तरफ़ भागती है। बेटे नीरज और घर की संभाल उसकी सबसे बड़ी ख़ुशी है। नीरज को साफ़ रखना और चुस्त पौशाक पहनाना उसकी पहल है। मगर चाव उसे लड़की को जन्म देने का है। कहेगी, ‘बस जैसे ही मेरा नीरज स्कूल जाने लगेगा, मैं सुंदर-सी लड़की को जन्म दूंगी।’ मैं कहती हूं, ‘अगर लड़का हो गया तो?’ वह जवाब देगी, ‘फिर मैं लड़की गोद लूंगी।’ मैं बबिता की स्पष्टता और पक्के इरादे पर हैरान होती हूं।



सुबह रसोई के काम दौरान मेरा रेडियो चलता रहता है। बबिता को भी शास्त्रीय संगीत सुनना अच्छा लगता है, जबकि आम कामकाज वाली औरतें अक्सर टीवी चलाने पर ज़ोर देती हैं। बबिता का घरवाला शराबी नहीं। उसकी छोटी बहन की शादी उसके देवर से हुई है। घर में बहुत ही सुखद माहौल है। कुल मिलाकर बबिता सुखी है, जिस कारण हंसती खेलती आती-जाती है। जो बात मैं आपसे करने जा रही हूं, वह तब की है, जब टीवी के हर चैनल पर अभिषेक बच्चन और एश्वर्या राय की शादी की खबरों का बाज़ार गर्म था। बबिता के दिमाग़ पर एश्वर्या राय की ख़ूबसूरती का भूत सवार था।



‘हाय! मैं मर जां। ऐनी सोहणी। निगलण नू जी करदा। अभिषेक बच्चन से शादी हो रही है उसकी। मन में आता है कि मैं अगले जन्म में एश्वर्या राय जैसा ही सुंदर बनूं। मैं तो हर रोज़ भगवान के आगे प्रार्थना करता हूं कि वह मुझे बस एश्वर्या जैसा बना दे।’ ऐसा कहते बबिता अपनी बांहें ऐसे समेटती, जैसे एश्वर्या को आगोश में ले रही हो। ‘दूसरा जन्म लेने के लिए तुझे मरना पड़ेगा। वह भी इस जवान-जहान उम्र में। अभी तूने देखा ही क्या है?’ मैं कहती, तो उसका जवाब होता, ‘अगर गारंटी हो कि मैं मरकर एश्वर्या ही बनूंगा, तो इसी व़क्त मर जाऊं।’ फिर बबिता एश्वर्या और अभिषेक बच्चन की शादी की तैयारियों के बारे में बताती। कभी एश्वर्या के लहंगे की बात करती, कभी गहनों की, कभी एश्वर्या की डोली का बयान और कभी उसके विवाह में शामिल हो रहे लोगों का। एश्वर्या..एश्वर्या..एश्वर्या।



एक दिन तो हद ही कर दी बबिता ने। भागी-भागी आई और हांफते हुए टीवी चालू करने के लिए कहने लगी, ‘जल्दी करो मम्मी जी, टीवी लगाओ।’ मैंने पूछा, ‘क्या हो गया आज तुम्हें?’ वह बोली, ‘एक लड़की ने अपनी बाजू काट ली है। कह रही है कि मैं अभिषेक बच्चन के साथ ही शादी करवाऊंगी।..जल्दी करो।’ मैंने टीवी ऑन किया। चैनल पर जाहनवी कपूर पुलिस को बयान दे रही थी कि अभिषेक ने उसे धोखा दिया है। ‘हाय! मैं मर जां। कल एश्वर्या की शादी और आज उसकी मेहंदी की रात और ऊपर से यह अनर्थ।..सारी दुनिया से सुंदर एश्वर्या और उससे इतना बड़ा धोखा। ..अभिषेक एश्वर्या के बिल्कुल काबिल नहीं।’ बबिता ऐसे बोल रही थी, जैसे ख़ुद एश्वर्या हो। मैंने कहा, ‘ये सब चर्चा के लिए भी हो सकता है।’ पर नहीं, बबिता का सरोकार सिर्फ़ एश्वर्या से ही था। उसके लिए अभिषेक दरिंदा था, धोखेबाज़। बुड़बुड़ करती घर से बाहर चली गई।



अगली सुबह बबिता आई। गुमसुम। ‘आज एश्वर्या का क्या समाचार है?’ मैंने उसे छेड़ा। ‘अरबोंपति एश्वर्या का ससुर, अमिताभ बच्चन। लाखों रुपयों की एश्वर्या की डोली बनाई, करोड़ों के गहने और कपड़े, लेकिन बारात में सिर्फ़ तेरह आदमी लेकर गए। छीं-छीं कितनी •यादती है एश्वर्या के साथ।..मैं उसकी जगह होता, तो बीस हज़ार बाराती लेकर जाता।’ बबिता बहुत दुखी लग रही थी। ‘लेकिन इतनी बड़ी हस्तियों की शादी होना कोई आम बात नहीं। सौ तरह की दुश्मनियां होती हैं और ख़तरे भी। तुम्हीं तो कल जाहनवी कपूर वाली खबर दिखा रही थी। इतने में ही पुलिस को मुश्किल आई हुई थी। ये लोग तो हनीमून पर भी सिक्योरिटी के बिना नहीं जा सकते। वे तुम्हारी तरह बिंदास नहीं जी सकते।’ मैंने दलील दी।



‘फिर वह काहे की एश्वर्या हुई? वह तो कैदण हुई। चारों तरफ़ पुलिस वाले। हमने क्या लेना ऐसी ख़ूबसूरती और अमीरी से। हम तो ऐसे ही ठीक हैं। आज़ाद, मनमर्ज़ी के मालिक। मैंने नहीं बनना एश्वर्या राय। मैं तो बबिता
ही रहूंगी।’



-काना सिंह

Bookmark and Share


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: