पूरी दुनिया में 50 ज्वालामुखी अत्यधिक सक्रिय हैं। इन पर निगाह रखने और प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल कर भविष्य में जान-माल की तबाही रोकने की दिशा में पहला कदम उठाया जा चुका है। पिछले दिनों अमेरिका के सक्रिय ज्वालामुखी माउंट सेंट हेलेंस में ‘स्पाइडर्स’ को तैनात किया गया है। ये ‘स्पाइडर्स’ अंदर और बाहर से आंकड़े एकत्र कर भेजंेगे। इस तरह प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल कर भविष्य के लिए वृहद योजना तैयार की जा सकेगी।
दुनिया में अभी सैकड़ों सक्रिय ज्वालामुखी हैं, जो गाहे-बगाहे फटकर जान-माल को भारी क्षति पहुंचाते रहते हैं। लंबे समय से वैज्ञानिक ऐसी प्रणाली के विकास में लगे हुए थे, जो इन सक्रिय ज्वालामुखियों के फटने से पहले ही संकेत दे सके। ताकि वहां रहने वाली आबादी को समय रहते हटाकर कम से कम इंसानी जान तो बचाई ही जा सके। ऐसे में वैज्ञानिकों ने अब अमेरिका के सर्वाधिक सक्रिय ज्वालामुखी माउंट सेंट हेलेंस के भीतर और आसपास अत्याधुनिक ‘स्पाइडर्स’ तैनात करने में सफलता पाई है। इस तरह का तंत्र आने वाले समय में हमें ज्वालामुखी के सक्रिय होने की पूर्व सूचना दे सकेगा। पिछले दिनों हेलीकॉप्टर के जरिये इस अत्याधुनिक सेंसर यानी ‘स्पाइडर’ को ज्वालामुखी के भीतर 30 फुट नीचे स्थापित किया गया है।
प्रकृति पर रखेंगे निगरानी
वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी वैंकुवर के वेनझेन सोंग का कहना है, ‘इस प्रोजेक्ट का मकसद यह बताना है कि कम कीमत वाले सेंसर नेटवर्क के जरिए विषम परिस्थितियों में भी प्रकृति पर निगरानी रखी जा सकती है।’ गौरतलब है कि नासा प्रायोजित तकनीकी शोध कार्यक्रम के सोंग प्रमुख हैं। इस कार्यक्रम में अमेरिका का जियोलॉजिकल सर्वे और कैलीफोर्निया स्थित नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेट्री (जेपीएल) का भी सहयोग प्राप्त है। वास्तव में इन रोबोटिक प्रतिनिधियों का निर्माण ऐसे दुर्गम स्थानों को ध्यान में रखकर किया गया है, जहां इंसान नहीं पहुंच सकता। ये रोबोट्स अत्यधिक या न्यूनतम तापमान से लेकर दुर्गम भू-भाग में जाकर आवश्यक आंकड़े प्राप्त कर सकेंगे। माउंट सेंट हेलेंस में उतारे गए रोबोटिक प्रतिनिधियों का संपर्क ईओ-1 सेटेलाइट से है। इनकी मदद से ज्वालामुखी के भीतर और बाहर के प्राप्त आंकड़ों से महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने की योजना है।
हादसे से सबक
गौरतलब है कि वर्ष 1980 में माउंट सेंट हेलेंस ज्वालामुखी के अचानक सक्रिय हो जाने से वृहद स्तर पर जान-माल का नुकसान हुआ था। हालिया दिनों में वर्ष 2004 में यह अचानक फिर से सक्रिय हो उठा, जिस कारण आसपास के क्षेत्र को 26 मिलियन गैलन लावा ने अपने आगोश में ले लिया था। अब स्पाइडर्स की तैनाती के बाद यदि इस तरह के विस्फोट फिर से होते हैं तो आवश्यक जानकारी जुटाई जा सकेगी। इसका इस्तेमाल भविष्य में ज्वालामुखी के सक्रिय होने की स्थितियों से निपटने में किया जाएगा।
यह कार्यक्रम नासा के उस महत्वाकांक्षी अभियान का एक हिस्सा है, जिसके जरिए वह वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए जरूरी आंकड़े एकत्र कर इसका विश्लेषण करना चाहता है। आने वाले समय में इस तकनीक का इस्तेमाल सुदूर अंतरिक्ष में स्थित ग्रहों में होने वाले भौगोलिक परिवर्तन, भूकंप और धूल भरे तूफान जैसी अन्य हलचलों का पता लगाने के लिए किया जाएगा। जेपीएल के प्रोजेक्ट मैनेजर शैरन केडर के मुताबिक उम्मीद की जा सकती है कि इस तंत्र से भविष्य में दुनिया के अन्य सक्रिय ज्वालामुखियों में तैनात किए जाने वाले तंत्र के लिए आवश्यक खाका खींचा जा सकेगा। इससे जान-माल के नुकसान की दर में कमी लाई जा सकेगी।
ऐसा है स्पाइडर
प्रत्येक रोबोटिक स्पाइडर में भूकंप की पहचान के लिए सिस्मोमीटर होता है। साथ ही एक जीपीएस रिसीवर लगाया गया है, जो निश्चित स्थान की पहचान कर जमीनी आंकड़े और हलचलों को रिकॉर्ड कर सके। ज्वालामुखी विस्फोट को भांपने के लिए इंफ्रारेड साउंडर लगाया गया है। विस्फोट के बाद हवा में उठने वाले राख के गुबार को समझने के लिए लाइटनिंग डिटेक्टर लगाया भी है। इसे तिपाए पर टिकाया गया है, इस वजह से वैज्ञानिकों ने इसे स्पाइडर नाम दिया है।