जीवन में कुसंगति जहर की तरह है। जिसका संग बिगड़ गया, उसका धीरे-धीरे सब कुछ बिगड़ जाता है। कुसंग आपके अंतर में घुस गया तो दिल बिगाड़ता है। दिल बिगड़ता है तो दिमाग बिगड़ता है। दिमाग बिगड़ता है तो वर्तमान बिगड़ता है और वर्तमान बिगड़ता है तो भविष्य भी बिगड़ जाया करता है। जीवन उल्टा है। अपने वर्तमान को सुधारो तो भविष्य अपने आप सुधर जाया करता है। कुसंगति से बचो। यदि जीवन में कुसंग का प्रसंग कभी आ जाए तो सत्संग को याद करो।भोजन ग्रहण करने बैठो तो यह विचार करो कि प्रसाद ग्रहण कर रहे हो।
प्रसाद कैसा भी हो, उसके स्वाद के बारे में विचार नहीं किया जाता। प्रसाद तो आखिर प्रसाद है। भोजन भी प्रसाद है। जो तुम्हारे भीतर बैठे राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर को चढ़ाया जा रहा है। भोजन करने बैठो तो तुम्हारा चित्त भी वहां रहना चाहिए। भोजन में चित्त नहीं तो भोजन अधूरा है और जेब में वित्त नहीं तो आदमी अधूरा है। कुत्ते को कुछ खाते समय ध्यान से देखें- जब वह खाना खाता है तो अपनी दुम नहीं हिलाता।