आज हरितालिका तीज का व्रत है। हरितालिका व्रत धर्मपरायण सुहागिन भारतीय नारियों एवं कुंवारी कन्याओं का विशेष त्यौहार है। सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सुख-समृद्धि एवं ऐश्वर्य तथा सौभाग्य की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए हरितालिका तीज का व्रत श्रद्धा व भावपूर्ण संकल्प लेकर करती हैं। महिलाएं अन्न-जल ग्रहण किए बिना अपार श्रद्धा के साथ यह व्रत रखती हैं।
इसमें कन्याएं फलाहार व्रत एवं धर्मपरायण, निष्ठावान स्त्रियां निर्जल भी इस व्रत को संपूर्ण करके सौभाग्य की प्राप्ति करती हंै। इस व्रत को सर्वप्रथम उमा (मां पार्वती) ने किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस व्रत के दिन स्त्रियां मां पार्वती की कथा भी सुनती है, जिसमें पार्वतीजी के त्याग, धैर्य, एवं एकनिष्ठ पतिव्रत की भावना को जानकर मन ही मन भावविभोर हो उठता है। इससे स्त्रियों का मनोबल भी ऊंचा होता है, इस दिन मुख्यरूप से शिव-पार्वती तथा मंगलकारी गणोशजी की पूजा-अर्चना करने का विधान है, प्रात:काल सूर्योदय से पहले ही जागकर नित्यकर्मो से निवृत्त होने के बाद श्रद्धा व आस्था के साथ इस व्रत का संकल्प लेना चाहिए कि आज से मैं इस व्रत का पालन अपने सौभाग्य की वृद्धि के लिए करूंगी एवंअपनी मनोकामना को मां पार्वती के सम्मुख रखकर दिनभर प्रसन्न मन से ध्यान करना फलदायक सिद्ध होता है।
निष्ठापूर्ण एवं धर्मपरायण स्त्रियों को चाहिए कि वे अपनी कामनापूर्ति के लिए विधिपूर्वक संकल्प लेकर अपने घर को फूलों से सजाएं, साफ-सफाई एवं पवित्रता का पूरा ध्यान रखें। खुशी-खुशी पूजा सामग्री एकत्रित करें। इसके पश्चात मां पार्वती का ध्यान करें। कलश स्थापना करके शिव-गौरी का ध्यान करें। मंत्रों में विशेषकर ú उमायै पार्वत्यै शांति रूपिण्यै शिवायै ब्रrारापिण्यै नम: मंत्र से गौरी का एवं ú महादेवाय नम: से भगवान शिव का ध्यान करके स्थापना करें। तत्पश्चात तन-मन-धन से सामथ्र्यानुसार पूजा एवं दान करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गणोशजी को लड्डू का भोग लगाना न भूलें क्योंकि वे विघ्नहारी देवता हैं।
कुंवारी कन्याएं शीघ्र विवाह तथा मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए सौंदर्यलहरी या पार्वती मंगल स्तोत्र का पाठ करें। ऐसा करने से मां पार्वती प्रसन्न होकर शुभ फल की प्राप्ति का आशीर्वाद देती हंै। पार्वती मंगल स्तोत्र का पाठ करने से पहले हर सुहागिन महिला या कुंवारी कन्या को अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए अपने नाम का गोत्र सहित उच्चरण कर, जल से संकल्प लेकर पाठ आरंभ करना चाहिए। अत्यंत प्रेम व सच्ची श्रद्धा से इसका उच्चरण करें। शिव-पार्वती के सम्मुख बैठकर अपनी मनोकामना बताते हुए आनंद
िचत्त होकर इस व्रत को संपूर्ण करने से मानसिक प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषानुसार हमारे ऋ षि-मुनियों ने बताया है कि व्रत तप का ही एक प्रासंगिक संक्षिप्त स्वरूप है। इस व्रत का विधान अधिकतर आध्यात्मिक या मानसिक शक्ति की प्राप्ति, चित्त अथवा आत्मा की शुद्धि, संकल्प शक्ति की दृढ़ता, वातावरण की पवित्रता, विचारों के उच्च एवं स्वास्थ्य के लिए हितकारी होता है । भारतीय संस्कृति में हमारे शास्त्रों के अनुसार व्रत के द्वारा व्यक्ति अपने भौतिक एवं पारलौकिक संसार की सुव्यवस्था करता है। इसमें प्रत्येक वर्ण, वर्ग, आयु, जाति, साधना पद्धति, आश्रम और अभिलाष के लिए एक समान अवसर होता है। व्रत के दिन प्रात:काल नित्यक्रिया संपन्न करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए।
उसके बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर अभिमुख होकर हाथ में जल, चावल, सुपारी, पैसे और पुष्प लेकर इस मांगलिक व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प लेने से व्यक्ति की आंतरिक प्रमुख शक्तियां सजग होकर उनका मनोबल बढ़ाती हैं एवं श्रद्धा और विश्वास से मन ओत-प्रोत हो जाता है। व्रत के दिन मन से प्रसन्न होकर दिनचर्या निभानी चाहिए, इस दिन यथासंभव मौन रहने से आंतरिक शक्ति की प्राप्ति होती है। व्रत मानसिक एवं शारीरिक रूप से पवित्र रहने पर ही पूर्ण फलप्रदाता है। इस दिन क्रोध, ईष्र्या, द्वेष, घृणा, परनिंदा, आलस्य से बचना चाहिए।
इस दिन मां गौरी का ध्यान करके उनका चिंतन, दिन में उनकी महिमा का सात्विक साहित्य का अध्ययन करने से मानसिक बल की प्राप्ति होती है। व्रत करते हुए दिन में सोने से परहेज करना अति उत्तम माना गया है। भारतीय संस्कृति में व्रत के पश्चात अपने आराध्य को पूजा एवं मंत्रों से प्रसन्न करें। भगवान शिव की आराधना में धूप, दीप, गंध, चंदन का तिलक, चावल, बिल्वपत्र, पुष्प, शहद, यज्ञोपवीत, धतूरा, कमलगट्टा, आक का फल या फूल से अर्चना करें। मां गौरी को सुहागिन स्त्रियां और कुंवारी कन्याएं श्रंगार भेंट करें। अति प्रसन्न एवं श्रद्धापूर्वक लाल हरी या पीतांबरी रंग की चुनरी उढ़ाएं।
शुद्ध घी का दीपक लगाकर आरती उतारें। भगवान शिव भोलेबाबा एवं मां गौरी अति कृपालु हैं। वे सुहागिन स्त्रियों को पति की दीर्घायु, सफल जीवन का एवं कुंवारी कन्याओं को मनोवांछित वत की प्राप्ति कराने में विलंब नहीं होने देते। अत्यंत श्रद्धापूर्वक इस मंगलकारी हरियाली तीज का व्रत करने से महिलाओं एवं कुंवारी कन्याओं को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है। ज्योतिषनुसार आकाशीय ग्रहों के प्रभावानुसार मकर का बृहस्पति, वृषभ, कर्क, कन्या, धनु और मीन राशि वाली विवाह योग्य कन्याओं का विवाह कराने का प्रबल योग हैं।
इसके साथ जिन कन्याओं की जन्मकुंडली में गुरु, वृषभ, कर्क, कन्या और मकर राशि में स्थित है, उनके भी विवाह योग बनेगें। विवाह में विलंब टालने के लिए यह व्रत रामबाण सिद्ध होगा। इस राशि वालों को सामथ्र्यनुसार रेशमी व अर्पित करें। इसके पश्चात शिवालय में या घर में मानसिक रूप से प्रदक्षिणा करके अपनी जाने-अनजाने की गई त्रुटियों के लिए क्षम-याचना करनी चाहिए। इस व्रत का संबंध कृपा की देवी मां गौरी से है।
विवाह में बाधा आने पर उपाय स्वरूप पीली वस्तुओं का दान एवं आज के दिन मां गौरी को पीतांबरी चुनरियों उढ़ाएं एवं हर वीरवार को भगवान विष्णु को पीला वस्त्र एवं बेसन की बर्फी का भोग लगाकर मनोकामना पूर्ति कराएं। ब्राrाण को भोजन कराकर सामथ्र्यानुसार दान देकर आशीर्वाद लेना अति शुभ एवं फलप्रदाता होता है।