गणेशजी की पूजा अगर विधिवत की जाए, तो इनकी पतिव्रता पत्नियां रिद्धि-सिद्धि भी प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख शांति और संतान को निर्मल विद्या-बुद्धि देती हैं। गणेश जी ही ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा पत्तियों से भी करके आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। भगवान गणेश अपने भक्तों द्वारा कितने नामों से पुकारे जाते हैं, यह तो अगणनीय हैं। लेकिन उन सभी का सारांश यही है कि कलियुग में मां चंडी और भगवान गणोश शीघ्र फल देने वाले देवता कहे जाते हैं।
गणेशजी की पूजा इस चराचर जगत में कहीं भी सबसे पहले की जाती है। वैसे तो तिथियों में प्रत्येक चतुर्थी को भगवान विनायक की पूजा का महत्व है, किंतु भादौ शुक्ल चतुर्थी को सिद्धिविनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। भगवान गणेश के एक दांत हैं और दोनों कान सूप के समान हैं। मुंह हाथी के समान है और चार भुजाओं से सुशोभित हैं। ये अपने हाथों में पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं।
गणेश और हनुमान ही कलियुग के ऐसे देवता हैं, जो अपने भक्तों से कभी रुठते नहीं, अत: इनकी आराधना करने वालों से गलतियां भी होती हैं, तो वह क्षम्य होती हैं। साधना चाहे सात्विक हो या तामसिक, मारण, मोहन, उच्चटन, वशीकरण या फिर मोक्ष की साधना हो अग्रपूजा गणोशजी की ही होती है। गणेश जी ही ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा घास-फूस अपितु पेड़-पौधों की पत्तियों से भी करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। इनकी पूजा के लिए इनके प्रधान 21 नामों से 21 पत्ते अर्पण करने का विधान मिलता है।
विनायक की औषधि पूजा
इनको प्रसन्न करने के लिए इन पर निम्नलिखित पत्तों को अर्पण करें और उनके इन नामों को याद कर साथ ही बोलते भी रहें:-सुमुखायनम: स्वाहा कहते हुए शमी पत्र चढ़ाएं, गणाधीशायनम: स्वाहा भंगरैया का पत्ता चढ़ाएं, साथ ही उमापुत्राय नम: बिल्वपत्र, गज मुखायनम: दूर्वादल, लम्बोदराय नम: बेर के पत्ते से, हरसूनवे नम: धतूरे के पत्ते से, शूर्पकर्णाय नम: तुलसी दल से, वक्रतुण्डाय नम: सेम के पत्ते से, गुहाग्रजाय नम: अपामार्ग के पत्तो से, एक दंतायनम: भटकटैया के पत्ते से, हेरम्बाय नम: सिंदूर वृक्ष के पत्ते से, चतुर्होत्रे नम: तेजपात के पत्ते से, सर्वेश्वराय नम: अगस्त के पत्ते चढ़ावें। विकराय नम: कनेर के पत्ते, इभतुण्डाय नम: अश्मात के पत्ते से, विनायकाय नम: मदार के पत्ते से, कपिलाय नम: अर्जुन के पत्ते से, बटवे नम: देवदारु के पत्ते से, भालचंद्राय नम: मरुआ के पत्ते से, सुराग्रजाय नम: गांधारी के पत्ते से और सिद्धि विनायकाय नम: केतकी के पत्ते से अर्पण करें।
गणेशजी की आराधना बाजार के महंगे सामान के बजाए इन औषधियों से भी होती है। पत्रं पुष्पं फलं तोयं यों मे भक्त्या प्रच्छति अर्थात पत्र, पुष्प, फल और जल के द्वारा भक्ति भाव से की गई पूजा लाभदायी रहती है। किसी साधक और मंत्र के बीच श्रद्धा और विश्वास दोनों का होना अतिआवश्यक है। श्रद्धा तो है, किंतु विश्वास नहीं है, तो यह अर्थहीन रहेगा और विश्वास है लेकिन श्रद्धा नहीं है, तो भी साधना अर्थहीन ही रहेगी। इसके अतिरिक्त षोड़षोपचार विधि से इनकी पूजा की जाती है। गणेश की पूजा अगर विधिवत की जाए, तो इनकी पतिव्रता पत्नियां रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि भी प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख शांति और संतान को निर्मल विद्या-बुद्धि देती है।
भगवान गणेश की शास्त्रीय विधि भी इस प्रकार है। इनके क्रमों की संख्या 16 है। आह्वान, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंधपुष्प, पुष्पमाला, धूप-दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती-प्रदक्षिणा और पुष्पांजलि आदि। यहां पर पूजा का पूर्ण विधान लिखना संभव नहीं है, किंतु आप गणेश गायत्री मंत्र से ही इनकी आराधना का पूरा आनंद ले सकते हैं। भगवान गणेश की पूजा के लिए ऋग्वेद के गणेश अथर्व सूत्र में कहा गया है कि रक्त पुष्पै सुपूजितम अर्थात लाल फूल से विनायक की पूजा का विशेष महत्व है। आप स्नानादि करके सामग्री के साथ अपने घर के मंदिर में बैठे, अपने आपको पवित्रीकरण मंत्र पढ़कर घी का दीप जलाएं और दीपस्थ देवतायै नम: कहकर उन्हें अग्निकोण में स्थापित कर दें। इसके बाद गणेशजी की पूजा ऊपर कहे गए क्रमानुसार करें। अगर कोई मंत्र न आता हो, तो गं गणपतये नम: मंत्र को पढ़ते हुए पूजन में लाई गई सामग्री गणपति पर चढाएं, यहीं से आपकी पूजा स्वीकार होगी और आपको शुभ-लाभ की अनुभूति मिलेगी। यह सरल उपाय आपकी आसानी को ध्यान में रखकर दिया गया है।