पाकिस्तान के क़ायदे आजम जिन्ना पर कुछ भी लिखना बर्र के छत्ते को छेड़ने की तरह रहा है, क्योंकि उनके जिक्र के साथ हिंदुस्तान के बंटवारे की कड़वी यादें भी आ जाती हैं। जसवंत सिंह की नवीनतम किताब ‘जिन्ना: भारत-विभाजन के आईने में’ भी रिलीज होते ही विवादों में घिर गई है और जिन्ना को लेकर एक बार फिर भाजपा में घमासान मच गया है। पेश हैं, राजपाल एंड संस द्वारा प्रकाशित इस किताब के चुनिंदा अंश...
जिन्ना के साथ हमारा यह सफर उस रास्ते की ही पड़ताल करता है, जिस पर चलकर इस्लाम ने अपनी हमलावर की पहचान मिटाई, कैसे वह इस्लाम इतनी सहजता से पहले हिंदुस्तानी बना और फिर आगे चलकर इस देश को अपना घर बनाया और फिर उसी घर को तोड़ उसके दो कोनों में जाने को तैयार हो गया। मध्यकालीन हिंदुस्तान के बादशाहों, सुलतानों और नवाबों का मजहब, इस्लाम, कैसे मुल्क को तोड़ने वालों का मजहब बन गया? उन लोगों का मजहब, जिन्होंने देश को बांटा, खुद को भारत से निर्वासित किया और अपनी ही इच्छा से भारत के पूर्वी और पश्चिमी सीमावर्ती हिस्सों में चला गया- सियासती तौर से मजहब का यह ‘देशनिकाला’ ऐसा था कि इनसे जुड़े जो लोग हिंदुस्तान में ही रह गए, उनके जीवन में अपनी सच्ची पहचान को लेकर एक अविरत आत्ममंथन और संदेह भर गया। जो लोग यहीं रह गए, उनसे लगातार नीचा दिखाने वाले अंदाज में पूछा जाता रहा ‘तुम वास्तव में कहां के हो?’
ये हतप्रभ, परित्यक्त और बिफरे लोग अब ठीक ही पूछते हैं, ‘क्या हम उस इस्लामी उम्मा का हिस्सा नहीं हैं?’ और फिर मुस्लिम लीग के उस दावे का क्या हुआ कि सिर्फ वही ‘सब मुसलमानों की अकेली पार्टी और खास प्रतिनिधि है।’ लीग ने दावा यह भी किया था कि वही इस्लाम की वैचारिक प्रामाणिकता की सच्ची ध्वजवाहक है, वही मुस्लिम बहुमत की असली प्रतिनिधि भी है और इसी आधार पर तो जिन्ना ने एक अलग राष्ट्र की मांग रखी थी और अपने लिए एक अलग भू-भाग का दावा भी किया था। इसी कारण एक कचोटता हुआ सवाल सतत् हमारी चेतना से आज तक टकराता रहता है- किससे अलग? एक भौगोलिक और भू-राजनीतिक इकाई को किस तरह बांटें? बस मात्र नक्शों पर रेखाएं खींच कर ही? जैसा माउंटबेटन ने कहा था, यह बांट क्या ‘सर्जिकल ऑपरेशन’ के
जरिए? बड़े त्रासद ढंग से नेहरू, पटेल और कांग्रेस पार्टी ने भी यह विभाजन मान लिया था और जिन्ना ने तो खैर खुद ही यह रास्ता चुनने की मांग रखी थी।
यही मूल रूप में जिन्ना की राजनीतिक यात्रा थी। आख़िर किस तरह, बल्कि अधिक सांदर्भिक होगा यह पूछना : ‘क्यों उस व्यक्ति ने, जो बीसवीं शताब्दी के पहले 47 वर्षो में भारत के राजनीतिक नेतृत्व की पहली पंक्ति में खड़ा इतनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता रहा हो, उसने ख़ुद ही को उसी देश के एक कोने में निर्वासित कर लिया? साथ ही यह हिंदू-मुस्लिम एकता के श्रेष्ठ विचार की यात्रा भी है। जिन्ना को एक समय ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक’ माना जाता था, गोखले ने स्वयं उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत’ कहा था और आगे चलकर सरोजिनी नायडू ने भी उन्हें इसी रूप में सराहा था। आखिर किस तलाश, किस तकाजे ने जिन्ना को अपना रास्ता पलटने के लिए मजबूर कर दिया और वही जिन्ना, फिर क्यों हिंदू-मुस्लिम अलगाव के मुख्य प्रस्तावक, इस विचार की प्रमुख आवरण बन गए, पाकिस्तान के निर्माता बने? आयशा जलाल के शब्दों में, इसके ‘एकमात्र प्रवक्ता’ बन गए। क्या वास्तव में वे कभी इनमें से एक भी थे? या यह एक सामूहिक मानवीय विफलता थी, जिसने पाकिस्तान का निर्माण किया?
‘कांग्रेस से ज्यादा कांग्रेसी’
.और ससेन रूडॉल्फ ने एक बहुत ही विचारशील व्याख्यान में बड़ी शिष्ट साफगोई से यह प्रश्न सामने रखा है : जिन्ना को अपने अंतर्मन में ‘उदार, सर्वधर्मग्राही और सेक्युलर’ माना जाता रहा था। ऐसा व्यक्ति, जो भारत की एकता के लिए प्रतिबद्ध हो और जिसे वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने ‘कांग्रेस से भी ज्यादा कांग्रेसी’ समझा, तो ‘फिर क्या हुआ? कैसे विभाजन जैसी विप्लवकारी घटना संभव हुई, जबकि 1940 के दशक तक भी इसकी कल्पना तक नहीं की गई थी।’ और तो और, 1946 तक भी इसका कोई स्पष्ट ख़ाका ही नहीं था। फिर कैसे और क्यों ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का यह राजदूत,’ एक उदार संविधानवादी, एक भारतीय राष्ट्रवादी- मुहम्मद अली जिन्ना आगे चलकर वायसराय लॉर्ड वेवेल के शब्द में एक ‘फ्रैंकेस्टीन मॉन्स्टर’ (भस्मासुर) बन गए और उसी मुल्क और
धरती को तोड़ा, जिसने इतनी उदारता से उन्हें बनाया था।