कहानी- बादल
इंतज़ार हुसैन Monday, August 24, 2009 13:50 [IST]  

बादलों की तलाश में दूर तक गया। गली-गली होता हुआ कच्ची कुइयां पहुंचा। वहां से कच्चे रस्ते पर पड़ लिया और खेत-खेत चलता चला गया। सामने से एक घसियारा घास की गठरी लिए चला आ रहा था। उसे उसने रोका और पूछा कि ‘इधर बादल आए थे?’‘बादल?’ घसियारे ने उसे ताज्जुब से देखा, जैसे उससे बहुत अनोखा सवाल किया गया हो।‘हां, बादल।’और जब घसियारे की हैरत में कोई कमी न हुई, तो वो उससे मायूस हुआ और आगे चलकर उसने खेत में एक हल चलाते हुए किसान से यही सवाल किया, ‘इधर बादल आए थे?’किसान की समझ में भी यह सवाल न आया। उसने सिटपिटाकर कहा, ‘बादल?’ ‘हां-हां।’ असल में वो बादलों के मुताल्लिक़ ऐसे पूछ रहा था, जैसे ढूंढ़नेवाला राह चलते हुओं से ग़ुम हो जाने वाले बच्चे के मुताल्लिक़ पूछता है। शायद बादल भी ग़ुमशुदा बच्चे थे कि वो उन्हें ढूंढ़ता फिर रहा था और हर राह चलते से पूछ रहा था। मगर किसी ने उसे संतोषपूर्ण जवाब नहीं दिया।

सबसे पहले आज सुबह उसने अम्माजी से सवाल किया था, ‘अम्माजी, बादल कहां गए?’ ‘कौन कहां गए?’ अम्माजी ने उससे ऐसे पूछा, जैसे उसने बहुत अहमक़ाना सवाल किया था। ‘बादल।’ ‘बादल! अरे तेरा दिमाग़ चल गया है, जल्दी-जल्दी हाथ-मुंह धो, नाश्ता कर और स्कूल जा।’ अम्माजी के इस अंदाÊो-बयान ने उस पर एक नाख़ुशगवार असर छोड़ा। उसने बेदिली से हाथ-मुंह धोया, नाश्ता किया और किताबों का बैग गले में डाल स्कूल के लिए घर से निकला। मगर घर से निकलते ही उसके Êोहन में फिर वही सवाल उभरा, ‘बादल कहां गए?’ और इसके साथ उसे रात का वो व़क्त याद आया, जब उसने बादल उमड़ते-गरजते देखे थे। जब वो सोने लगा था, उस व़क्त आसमान बादलों से ख़ाली और सितारों से भरा हुआ था।

हवा बंद थी और गर्मी से नींद नहीं आ रही थी। उसे मुश्किल से नींद आई। फिर जाने क्या व़क्त था कि उसकी आंखें खुल गईं। जो भी व़क्त हो, उसके लिए वो आधी रात थी। दूर आसमान पर बादल एक गरज के साथ उमड़ रहे थे। बीच-बीच में बिजली चमकती और उस चमक में वो बादल बहुत काले-काले नÊार आते। उसे लगा कि बहुत Êाोर की बारिश आएगी। मगर उसमें नींद कितनी ख़राब होगी- इसी अंदेशे में उसने आंखें बंद कर लीं। ऐसे हो गया, जैसे उसे ख़बर ही नहीं है कि बादल गरज रहे हैं। सो गया। सुबह उठा तो हैरान रह गया, आसमान.. आसमान बादलों से बिल्कुल ख़ाली था और आंगन में बूंदें पड़ने के कोई आसार नहीं थे। उसे पहले ताज्जुब हुआ। फिर अफ़सोस हुआ।

ताज्जुब इस पर कि बादल इतने उमड़-घुमड़कर आए थे, और बरसे नहीं। फिर गए कहां! अफ़सोस इस पर कि वह सो क्यों गया! जैसे कि वो जागता रहता, तो बादल आंखों से ओझल नहीं हो पाते और फिर बरसकर ही जाते। वो बारिश हो जाती, तो मौसम की पहली बारिश होती। मगर उसके सोते व़क्त बादल घिर कर आए और चले गए! बारिश की कोई बूंद नहीं पड़ी। बरसात का मौसम ख़ाली गुÊारा जा रहा था। उसने चलते-चलते एक बार फिर आसमान का जायÊा लिया। दूर तक कोई बादल नहीं था। ख़ाली आसमान में सूरज ऐन उसके सिर पर चमक रहा था। वो स्कूल का रास्ता छोड़कर खेतों में निकल गया। खेतों के बीच पतली-पतली बटेओं पर होता हुआ वह दूर निकल गया।

धूप बहुत तेÊा थी, उसका बदन फुंकने लगा, हलक़ ख़ुश्क हो गया। कोई खेत पार करने के बाद कहीं छांव वाला एक पेड़ दिखाई दिया कि उसकी छांव में कुआं चल रहा था। गोया रेगिस्तान में चलते-चलते नख़लिस्तान आ गया। उसने दऱख्त की छांव में पहुंचकर किताबों का बैग एक तरफ़ रखा, कुएं के पास पहुंचकर रहट से निकलते हुए पानी से पैर धोए। हाथ-मुंह धोया और फिर जी भरकर पानी पिया।

मुंह-हाथ धोकर, पानी पीकर आंखों में ठंडक और रोशनी आई। अब उसने इर्द-गिर्द का जायÊा लिया। कुएं के पास ही टूटे से मूढ़े पर एक बड़े मियां बैठे हु़क्क़ा पी रहे थे। उसने कई मर्तबा बड़े मियां की तरफ़ देखा, कुछ कहना चाहा, मगर फिर हिम्मत छोड़ बैठा। आख़िर उसने हिम्मत बांधी और बोला, ‘बड़े मियां, इधर बादल आए थे?’ बड़े मियां ने हु़क्क़ा पीते-पीते उसे ग़ौर से देखा, फिर बोले, ‘बादल छिपकर तो नहीं आएंगे। जब घिरकर आएंगे, तो आसमान-Êामीन को पता चल जाएगा।’ ‘मगर रात को बादल आए थे और किसी को पता न चला।’ ‘रात बादल आए थे?’ बड़े मियां ने कुछ सोचा, फिर ऊंची आवाÊा में अल्लाहदीन से मुख़ातिब हुए, अल्लाहदीन बैलों को हांकते-हांकते रुका, बोला, ‘मैं तो जी रात खाट पे पीठ लगाते ही सो गया था, मुझे पता नहीं।’फिर बड़े मियां बोले, ‘बेटा, बादलों के खाली आने से कुछ नहीं होता। मैं ऐसे इलाके में रह चुका हूं जहां दस साल से बारिश नहीं हुई थी।’ ‘दस साल से?’ उसका मुंह खुला का खुला रह गया।

‘हां, दस साल से? मगर बादल आते थे, मैं जिन दिनों वहां था, उन दिनों भी एक दफ़ा बादल बहुत घिर के आए थे, मगर पानी की एक बूंद नहीं पड़ी।’‘अजीब बात है?’ ‘अजीब बात क्यों नहीं, बारिश उसके हुकुम से होती है। उसका हुकुम होता हैं, तो बादल बरसते है्रं, उसका हुकुम नहीं होता, तो बादल नहीं बरसते।’बड़े मियां के इस बयान के साथ-साथ उसकी कल्पना में ढेरों घटाएं घुमड़ आईं। वो घटाएं जो घटाटोप अंधेरे के साथ उठीं, जैसे बरसकर जल-थल एक कर देंगी। मगर एक बूंद बरसाए बग़ैर गरज गईं। वो घटाएं जो चंद बेमानी-सी बदलियों की सूरत में जाएं और ऐसे बरसें कि ताल-तलैया उमड़ जाएं।

बड़े मियां ने तपते आसमान की तरफ़ देखा। फिर बड़बड़ाए, ‘मौसम गुज़रा जा रहा है, पता नहीं उसका हुकुम कब होगा।’जवाब में वो भी बड़बड़ाया, ‘पानी बरसता ही नहीं। पता नहीं बादल आकर कहां चले गए।’‘बेटा क्या बरसे, बरसेगा तो ख़बरें आने लगेंगी कि सैलाब आ गया। आसमान कंजूस हो गया। ज़मीन में क्षमता नहीं रही। बारिश होती ही नहीं। होती है, तो सैलाब उमड़ पड़ता है।’बड़े मियां की बातं उसकी समझ में कुछ आईं, कुछ न आईं। वो बैठा सुनता रहा। फिर अचानक उसे ़ख्याल आया कि बहुत देर हो गई है, किताबों का बैग उठा, गले में डाल, उठ खड़ा हुआ।मिट््टी, धूल और धूप में वो देर तक चलता रहा। जिन रास्तों से आया था, उन्हीं रास्तों से लौट रहा था। धूप अब भी तेज़ थी। मगर जब भी कच्ची कुइयां के पास पहुंचा, तो उसे लगा कि हवा में ठंडी लकीर-सी तैर गई है और क़दमों में नीचे मिट्टी कुछ सीली-सीली-सी है।

बस्ती में दाख़िल होते हुए उसने देखा कि रास्ता यहां से वहां तक गीला है। दरख्त जो कि उसके जाते व़क्त रोज़ की तरह धूल में अटे खड़े थे, अब नहाए-धोए नज़र आ रहे हैं और नाला जो कि पिछली बरसात के बाद से ख़ुश्क चला आ रहा था, रवां हो गया है। ख़ुशी की एक लहर उसके अंदर दौड़ गई। अब उसे घर पहुंचने की जल्दी थी। वो देखना चाहता था कि उसके आंगन में जो जामुन का पेड़ खड़ा है, वो कितना तरोताज़ा हुआ है।

घर पहुंचकर उसने फ़िज़ा को बारिश के हिसाब से बदला हुआ पाया। जामुन से बहुत से पत्ते नीचे गिरे पड़े थे और गीली-मिट्टी में लथपथ थे। बाकी दऱख्त नहाया-धोया खड़ा था और अम्माजी एक संतुष्टि के लहÊो में कह रही थीं, ‘अच्छी बारिश हो गई, अल्लाह तेरा शुकर है। मेरा तो गरमी में दम उलटने लगा था।’

जामुन की टहनियों से बूंदें अभी तक टप-टप गिर रही थीं। वो पेड़ के नीचे खड़ा हो गया और बूंदों को अपने सिर पर और अपने गालों पर लिया। उसकी नज़र आसमान पर गई। आसमान धुला-धुला नज़र आ रहा था। अब वहां कोई बदली नहीं थी। उसे ख्याल आया कि वो बादलों की तलाश में धूप और धूल में कितनी दूर तक गया और बादल उसके पीछे आए और बरसकर चले भी गए। इस ख्याल ने उसे उदास कर दिया। बारिश में भीगी सारी फ़िज़ा उसे बेमानी नज़र आने लगी।

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