Dharm Darshan
परमात्मा का चित्र नहीं बनता चंचल चित्त में
पं. विजयशंकर मेहता Tuesday, August 25, 2009 10:20 [IST]  

चित्त चंचल है, इसे रोकना मुश्किल है। समझदार लोग चित्त को ऐसा सरल बना लेते हैं जैसे धनुष-बाण बनाने वाला बाण को सीधा बनाता है। बाण जितना सीधा होगा, लक्ष्य पर उतनी ही तीव्रता और सही ढंग से पहुंचेगा।



चित्त की चंचलता पूरे जीवन में हलचल मचाती रहती है। चंचल चित्त अनेक परिणाम देता है। उनमें से एक है स्वप्न। स्वप्न हमें बताते हैं कि हमारे जीवन में कहां कमी हो गई है। जो चीजें अपर्याप्त हो गईं, हम उन चीजों का सपना देखने लगते हैं। हमने जो दुनिया से छिपाया है सपने हमें उनके बारे में बता देते हैं।



गांधीजी कहा करते थे कि दिनभर तो मैं ब्रrाचर्य साध लेता हूं, कोई परेशानी नहीं होती, संयम मेरी मुट्ठी में रहता है किंतु रात में सपनों को मैं संभाल नहीं पाता। संयम फिसल जाता है। गांधी सच्चे आदमी थे तो उन्होंने बयां भी कर दिया, लेकिन हम अपने सपनों पर भी आवरण ढंक देते हैं। हमें जागते हुए तो झूठ की कला आती ही है, सोते हुए भी हम सच से दूर हो जाते हैं। गौतम बुद्ध ने कहा था कि चित्त चंचल है, इसे रोकना मुश्किल है। समझदार लोग चित्त को ऐसा सरल बना लेते हैं जैसे धनुष-बाण बनाने वाला बाण को सीधा बनाता है।



बाण जितना सीधा होगा, लक्ष्य पर उतनी ही तीव्रता और सही ढंग से पहुंचेगा। चित्त को मिटाना नहीं है, चित्त को समझ लेना है। लोग अपनी सारी ऊर्जा चित्त को मिटाने में, उससे झगड़ा करने में लगा देते हैं। इसीलिए चंचल चित्त को लेकर परमात्मा तक नहीं पहुंच पाते। भगवान की विशेषता है कि वह हमेशा रहता है। जो शाश्वत है, उसे ढूंढने में चंचल चित्त बाधा पहुंचाता है। ऐसे परमात्मा का चित्र चंचल चित्त में बन नहीं पाता, लेकिन वह है जरूर। चित्त की चंचलता विचारशून्य होकर रोकी जा सकती है और उसका एक तरीका है ध्यान। इसका आरंभ करिए और जरा मुस्कराइए..।

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