इंदौर. संदर्भ केंद्र, रूपांकन और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में इस नाटक से महान नाटककार हबीब तनवीर को सच्ची श्रद्धांजलि दी गई। 1959 में हबीब तनवीर और मोनिका मिश्रा तनवीर द्वारा शुरू किया गया नया थिएटर आज थिएटर के नए व्याकरण के लिए जाना जाता है। चरणदास चोर राजस्थान के लेखक विजय दानदेथा ने लिखा और उसे हबीब तनवीर ने नाटच्यरूप में ढाल दिया। लगता ही नहीं कि चरणदास छत्तीसगढ़ी नहीं बल्कि राजस्थानी था।
प्रतीक है चरणदास- चरणदास एक सच्चा चोर है। वह चोरी भी लोगों को बताकर करता है। एक दिन चरणदास के सामने धर्म संकट आ जाता है कि या तो सच बोले या जान गंवाए। सच की पताका उठाए चरणदास इस दुनिया से कूच कर जाता है लेकिन जान बचाने के लिए झूठ नहीं बोलता। एक घंटे पचास मिनट का यह नाटक गुदगुदाने के साथ उस सड़ांध को उबारने में भी सफल रहा जो आजाद और खुशहाल भारत के कीमती कालीन के नीचे दबी पड़ी है।
अभिनय की अनूठी झलक- चरणदास की भूमिका में ओंकारदास, हवलदार की भूमिका में रविलाल सांगड़े और गुरुजी बने मनहरन गंधर्व को देखकर मुंह से निकल पड़ता है- यही है भारत की असली तस्वीर। रानी का किरदार निभा रहीं नगीन तनवीर हो या जुआरी बने अमरसिंह गंधर्व सभी का अभिनय अप टू द मार्क रहा। रविलाल के स्टेज पर आते ही दर्शकों में जब-तब हंसी की लहर दौड़ती रही। चरणदास चोर के किरदार को आप महज ठहाका लगाकर भूल नहीं सकते। इसके सारे पात्र हमें आजाद भारत की मजबूरी याद दिलाते हैं। पुलिस, प्रशासन, पाखंड की बेड़ियों में जकड़ा चरणदास व्यक्ति नहीं भारतीयता का प्रतीक बन चुका है।
लोकगीतों की सौंधी सुगंध है नाटक में - स्टेज पर एक चबूतरा और पास में लगा पेड़, सिंपल लेकिन इस कल्पनाशील डेकोरेशन से कथा को बल मिलता है। पेड़ के बिंब की सहायता से कई डायमेंशन दिखे जैसे यही चबूतरा साधु का अखाड़ा बन जाता है और राजदरबार भी। बैकग्राउंड म्यूजिक में नया थिएटर के सबसे पुराने कलाकार देवीलाल नाग ने अच्छे प्रयोग किए हैं। वे तबले पर कंघी घिसकर एक सस्पेंस साउंड क्रिएट करते हैं। कुल मिलाकर चरणदास चोर राजस्थान की रेत से उठकर छत्तीसगढ़ की सौंधी मिट्टी में सना लोकगीत बन चुका है।
नगीन और साथियों का गायन भी दिल को छूने वाला है। इस मौके पर आमंत्रित पेरीन दाजी ने नया थिएटर के कलाकारों को प्रतीक चिह्न भेंट किया। नाटक की इस प्रस्तुति में इप्टा के महासचिव हरिओम राजोरिया सहित कई साथी भी मौजूद थे। नाटक देखने के लिए शहर के आसपास के दर्शकों के साथ दिल्ली और मुंबई से भी चरणदास को देखने वाले भी आए थे। हॉल की कैपेसिटी से ज्यादा दर्शकों की उपस्थिति ने हबीब को सच्ची श्रद्धांजलि दी।