डैडी कूल : कॉमेडी का क्रियाकर्म, एक्टिंग का श्राद्व
RAJESH YADAV Friday, August 28, 2009 19:02 [IST]  

बैनर : मारुती पिक्चर एवं बिग पिक्चर

निर्देशक : के. मोहन मुरली राव

कलाकार : सुनील शेट्टी, आफताब शिवदासनी, जावेद जाफरी, राजपाल यादव, आशीष चौधरी, सोफी चौधरी, टच्यूलिप जोशी, आरती छाबड़िया, किम शर्मा, और प्रेम चोपड़ा

संगीत : रागव सच्चर

कहानी और पटकथा : तुषार हिरानंदानी

संवाद : फरहाद - साजिद

लंबे समय बाद फिल्म निर्देशक के. मोहन राव अपनी नई फिल्म डैडी कूल के साथ दर्शकों से रुबरू हुए है। फिल्म का नाम भले ही डैडी कूल हो लेकिन इसमें द्विअर्थी संवाद, और गालियों को बेखौफ अंदाज में प्रस्तु करने में निर्देशक ने कुछ ज्यादा ही ध्यान दिया है। बेदम कहानी और एक लचर पटकथा के साथ कोई भी निर्देशक बेहतरीन फिल्म किस तरह बना सकता है यह सोचने वाली बात है। ऐसा लगता है बॉलीवुड में स्टोरी आइडिया का टोटा कुछ ज्यादा ही हो गया है।

जहां तक फिल्म की कहानी की बात है तो स्टीव (सुनील शेट्टी) अपने पिता डगलस के फ्यूरनल में अपने रिश्तेदारों को आमंत्रित करता है। वह गोवा में अपनी मां और पत्नी के साथ रहता है। फिल्म में एंड्रू (राजपाल यादव) नामक एक चरित्र सुनील शेट्टी के पिता डैडी कूल डगलस के साथ अपने झूठे संबधों के आधार पर स्टीव को ब्लैकमेल करने का प्रयास करता है लेकिन उसका भेद अंत में खुल जाता है। अंत्येष्ठी में कॉमेडी पैदा करने के प्रयासों में घटिया पटकथा और अश्लील संवादों ने ऐसा कांधा लगाया है कि मरने वाले तक की आह निकल गई है।

हालांकि फिल्म में कालरेस (जावेद जाफरी), आयशा (सोफी चौधरी) मारिया (ट्यूलिप जोशी), माइकल (आफताब शिवदासनी) ने अपने अभिनय से हास्य उत्पन्न करने का कुछ प्रयास किया है।

जहां तक कलाकारों की बात है तो सुनील शेट्टी का और आफताब शिवदासनी ने अपने रोल के साथ न्याय किया है। स्टीव के रोल में सुनील शेट्टी ने उम्दा अभिनय किया है और अंत में जो उन्होंने स्पीच दी वह बेहद उम्दा है। सोफी चौधरी , ट्यूलिप जोशी और आरती छाबड़िया के लिए करने लायक कुछ विशेष नहीं था इसलिए उनसें कुछ बेहतर की उम्मीद करना बेमानी बात होगी। कॉमेडी फिल्म में राजपाल यादव जैसे कलाकार को गंभीर और खलनायक की भूमिका देना समझ के परे की बात है।

संगीतकार राघव सच्चर ने फिल्म के प्रोमो में अच्छा संगीत दिया है और चूंकि फिल्म में गाने की गुंजाइश कम थी इसलिए राघव को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

फिल्म में द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल से हास्य उत्पन्न करने की कोशिश की गई है। हालांकि संगीत प्रधान फिल्म ना होने के बावजूद उतनी निराश नहीं करती है, हां इसका प्रस्तुतीकरण कुछ अलग अंदाज में होता तो फिल्म में बेहतर हास्य उत्पन्न हो सकता था।

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Comments
AMARDEEP
Friday, 28th Aug 2009, 20:23
very good i like it



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