बेंगलुरू. देश में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में क्रांति लाने का श्रेय प्राय: भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दिया जाता है, लेकिन वास्तव में देश से सॉफ्टवेयर निर्यात की बुनियाद उनकी मां इंदिरा गांधी ने पहले ही रख दी थी। यह खुलासा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी पर आई एक नई पुस्तक में किया गया है।
‘द लांग रिवॉल्यूशन
द बर्थ एंड ग्रोथ ऑफ इंडियाज आईटी इंडस्ट्री’ नामक इस पुस्तक में कहा गया है कि 1984 की आईटी नीति में उपग्रह के जरिए सॉफ्टवेयर निर्यात नीति को इंदिरा गांधी कैबिनेट ने हरी झंडी दी थी, लेकिन इसकी घोषणा इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 19 नवंबर 1984 को राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने की थी। पेशे से विज्ञान पत्रकार और पुस्तक के लेखक दिनेश सी शर्मा कहते हैं कि उपग्रह के जरिए सॉफ्टवेयर निर्यात नीति के कारण ही टैक्सास इंस्ट्रुमेंट्स (टीआई) जैसी अमेरिकी कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हुई थीं और देश से सॉफ्टवेयर निर्यात किए जाने की नई राह खुली थी।
शुरुआत में टीआई समेत दो अन्य कंपनियों को उपग्रह लिंक के साथ सॉफ्टवेयर इकाई लगाने के लिए लायसेंस दिया गया था। पुस्तक में कहा गया है कि कंप्यूटर और इलेक्ट्रानिक्स सेक्टर, ग्रामीण डिजिटल टेलीफोन एक्सचेंज, सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क, रेलवे में कंप्यूटरीकरण जैसे कई नीतिगत फैसलों के लिए राजीव गांधी को श्रेय दिया जाता है, लेकिन इनकी वास्तविक बुनियाद इंदिरा गांधी ने 1980 में सत्ता में आने के बाद से ही रखनी शुरू कर दी थी।
शर्मा के अनुसार 1980 के बाद इंदिरा गांधी काफी बदली हुई नजर आईं। उन्होंने 1970 के कड़वे अनुभवों से सीख लेते हुए देशहित में कई बेहतर नीतिगत निर्णय लिए। ऐसा लग रहा था जैसे वे पिछले दशक में अपनाई अति समाजवादी नीतियों पर पश्चाताप जता रहीं हो।