Dharm Darshan
ग्रह चर्चा
सविता शर्मा ‘संयम’ Sunday, September 06, 2009 12:25 [IST]  

जीवन का संपूर्ण सुख-दुख, जय-पराजय आदि विषय नवग्रहों पर आधारित है। ये ग्रह २७ नक्षत्र एवं १२ राशियों पर लगातार भ्रमण करते रहते हैं, जिससे ऋ तुएं, वषर्, मास और दिन-रात बनते हैं। ये अपनी-अपनी गति के अनुसार कर्मो का फल भी प्रदान करते है। प्रत्येक ग्रह एक विशेष विभाग का अध्यक्ष है। हमारे कर्मानुसार ये ग्रह अपनी दशा में अपना अच्छा या बुरा फल देते हैं। इन्हीं ग्रहों में शनि को संतुलन एवं न्याय का ग्रह माना गया है। यह परम न्यायाधीश, कृपालु और जीव का परम हितैषी ग्रह है। शनि केवल उन्हें पीड़ित करते हैं, जो लोग अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं तथा कुसंगति में फंसकर बुरे कार्य करते हैं और मांस-मदिरा एवं अस्वाभाविक क्रियाओं में अपना समय बिताते हैं। शनि के कुपित होने से पहले व्यक्ति ने कहीं न कहीं अन्याय और अनावश्यक विषमता का साथ दिया होगा।



वास्तव में शनि एक तप कारक ग्रह है। शनि व्यक्ति का अहंकार चूर कर ईश्वर की शरण में ले जाने वाले आध्यात्मिक ग्रह भी हैं, जो एक तरह से हमारे जीवन में कठोर आचार्य की भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत राहु-मंगल आदि क्रूर ग्रह व्यक्ति को पापी व घोर भौतिकतावादी बना देते हैं। भारतीय धर्म दर्शन और अध्यात्म के मुताबिक ईश्वर ने नवग्रहों को सृष्टि संचालन का दायित्वसौंपा है। इसमें आठ ग्रहों को न्यायाधीश और एक ग्रह शनि को परम न्यायाधीश (दंडाधिकारी) का काम दिया गया है।



कहीं शुभ-कहीं अशुभ



यह भारतीय ज्योतिष की विडंबना ही है कि शनि को डरावना, क्रूर और पापी ग्रह बताया गया है। यह एक भ्रामक तथ्य है। शनि अमंगलकारी नहीं बल्कि मंगलकारी भी हंै। व्यक्ति को उसके कर्मानुसार अपनी शुभ दृष्टियों के प्रभाव से ताज भी पहनाते हैं और अशुभ स्थितियों में राजा को रंक बनाने से भी नहीं चूकते। सौम्य ग्रहों की दृष्टि जहां-जहां पड़ती हैं, वह भाव अच्छा फल देते हैं,
जहां पर बैठते हंै, वहां नुकसान जैसा ही माना गया है। ऐसा शनि के मामले में विपरीत है। शनि का बैठना वृद्धि का सूचक माना जाता है। इसके अलावा शनि का अपने स्वयं के भाव षष्टम, अष्टम या द्वादश पर बैठना शुभ माना गया है। शनि मित्र राशियों में भी शुभ फल प्रदान करते हैं, परंतु इन स्थानों में बैठकर जहां-जहां शनि की दृष्टि पड़ती है, उन भावों से संबंधित कष्ट व्यक्ति को भोगने ही पड़ते हंै। शनि की महादशा १९ वष्रो की होती है।इसकी ७ वर्ष छ: माह तक की अवधि को साढ़े साती कहते हैं। शनि ग्रह ३क् वर्ष में अपनी परिक्रमा पूरी करते हैं। शनि की साढ़े साती तीन राशियों पर एक साथ प्रभाव डालती है।




शनि ग्रह की महादशा में शनि के साथ जब-जब उसके मित्र ग्रहों का अंतराल जैसे राहु-बुध-गुरु-शुक्र का समय आता है, तो जीवन में अच्छी घटनाएं घटित होती हैं और जब शनि महादशा में केतु-सूर्य-मंगल-चंद्रमा का अंतराल आता है, तब व्यक्ति को ज्यादा कष्ट भोगने पड़ते हैं। शनि इस जन्म के पाप-पुण्य के साथ-साथ पूर्व जन्म के पाप-पुण्यों का भी फल देते हैं। वर्तमान समय यानी कलियुग में शनि बाबा भी दंड देने में नम्रता बरतने लगे हैं। वर्तमान समय में अच्छे आध्यात्मिक, वैदिक, दैविक एवं पौराणिक उपायों से शनि शांति करके या कराके अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मो के लिए क्षमा याचना की जा सकती है। इससे शनि ग्रह भी प्रसन्न होकर उन्हें सौभाग्य, समृद्धि एवं निरोगी काया का आशीर्वाद देते हैं।



जाग्रत देव



कलियुग में तीन जाग्रत देव माने गए हैं - शनिदेव, भैरवजी एवं हनुमानजी। इन तीनों की वंदना करने से शीघ्र लाभ की प्राप्ति होती है। शनि पूजन सामान्य पूजन से अधिक फलदायी और जीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है। किसी भी देवी-देवता या आराध्य की आराधना हम सभी किसी न किसी मनोकामना की पूर्ति के उद्देश्य से करते हैं, परंतु शनिदेव की पूजा में व्यक्ति अपनी पिछली भूलों की क्षमायाचना और वर्तमान के लिए सुधार का वचन देता है। इनकी पूजा-आराधना हमेशा पूर्व जन्म के पाप, अपराधों की क्षमा प्रार्थना हेतु एवं इस जन्म के वर्तमान संकटों से बचने के लिए की जाती है। शनि की पूजा के माध्यम से हमारे सारे पाप कर्मो का प्रायश्चित होता है। शनिदेव से संबंधित देवतागणों में भगवान शिव हैं। शनिदेव ने ब्रrाजी की तपस्या करके उन्हें अपना आजीवन गुरु बनाया था।



शनि महाराज युवा काल तक भगवान कृष्ण के भक्त भी रहे हैं। भगवान कृष्ण की भक्ति में वे इतने लीन रहते थे कि उन्हें अपने आसपास का ध्यान ही नहीं रहता था। इसी कारण शनि ग्रह को अपनी पत्नी ध्वजिनी का श्राप प्राप्त हुआ।शाों के अनुसार शनि देव की सीधी दृष्टि अशुभ कहलाती है। यही श्राप उन्हें अपनी पत्नी द्वारा मिला था। भगवान शिव की आराधना या ब्रrाजी के दर्शन करने वाले पर शनि की पीड़ा इसलिए कम आती है क्योंकि वे शनिदेव के आराध्य देव हैं। अपने कठिन समय में इन देवों की पूजा-अर्चना अधिक फलदायी सिद्ध होती है। वास्तव में शनिदेव तो कर्मयोग के पक्षधर हैं। कर्मशील व्यक्ति को विपरीत दशा भी प्रभावित नहीं कर पाती। कर्मशील व्यक्ति के लिए वे दयालु और कल्याणकारी देवता हंै।

 
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