अध्यात्म क्षेत्र की दो प्रमुख धाराएं हैं- ज्ञान और भक्ति। दोनों की अपनी महत्ता व उपयोगिता है। ज्ञान को यदि मनुष्य का मस्तिष्क कहा जाए तो भक्ति को हृदय कहा जा सकता है। मानवीय काया में स्थित हृदय एवं मस्तिष्क में से जब कोई एक अंग कार्य करना बंद कर देता है तो जीवन की सारी कार्यप्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाती है। इसी तरह जब भक्ति या ज्ञान में से किसी एक को अधिक महत्व दिया जाने लगता है तो प्राय: जीवन में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।
आध्यात्मिक क्षेत्र में समग्र उन्नति के लिए भक्ति और ज्ञान दोनों की अनिवार्य आवश्यकता है। वस्तुत: अपने उच्चस्तरीय आयाम में इन दोनों में कोई भेद नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ में कहा है- भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।। अर्थात भक्ति और ज्ञान में कोई अंतर नहीं है। दोनों मिलकर संसारजनित दुख का हरण करते हैं। ज्ञानरहित भक्ति से अथवा भक्तिरहित ज्ञान से भवदुख का अंत नहीं हो सकता। इन दोनों के संयोग से ही भौतिक दुखों का निवारण होता है।