वह मई की तपती दोपहरी थी। सिम्मी की मम्मी पम्मी, प्रखर और दो बड़े-बड़े बैगों के साथ बस से उतरीं। सबसे पीछे सिम्मी बस से उतरी। बस से उतरते ही तेज लू का थपेड़ा सिम्मी के चेहरे पर पड़ा। वह तिलमिला गई। पास ही बरगद की घनी छाया थी। लेकिन सामान के साथ वहां तक पहुंचना मुश्किल था। मम्मी किसी रिक्शेवाले की प्रतीक्षा करने लगीं। दो खाली रिक्शे गुजर गए। मम्मी उन्हें देखती रहीं। सिम्मी बोली, ‘मम्मी, रिक्शेवाले को बोलो न, यहां खड़ा नहीं हुआ जा रहा।’ जवाब में मम्मी ने पम्मी के सिर को साड़ी के पल्लू से ढंक दिया। वे जानती थीं किसी रिक्शेवाले से पहले बोलने का मतलब है उसे मुंहमांगी कीमत देना। वे किसी भी कीमत पर अपनी मजबूरी का लाभ किसी को नहीं उठाने देना चाहती थीं।
कुछ देर बाद एक रिक्शेवाले ने सामने रिक्शा रोककर पूछा, ‘अम्मा, कहां जाना है?’ मम्मी ने दूसरी तरफ देखकर कह दिया, ‘कचरू नगर चलोगे?’ रिक्शेवाला सोच में पड़ गया। वह भोजन करने अपने घर जोरातराई जा रहा था। कचरू नगर जाने का मतलब था घंटाभर की देरी। उसे सवारी की आवश्यकता नहीं थी। बच्चे और सामान को देखकर उसने सोचा कि अगर कहीं रास्ते में छोड़ना हो, तो ले चलेगा।
रिक्शेवाला बोला, ‘चलो अम्मा।’ मम्मी पम्मी को गोद में लेकर रिक्शे में बैठ गईं। रिक्शेवाले ने दोनों बैगों को रिक्शे पर लादा और प्रखर को पकड़कर रिक्शे पर बिठा दिया। सिम्मी फुर्ती से रिक्शे पर सवार हो गई। रिक्शेवाले ने नाल तानकर उन सबको कुछ इस तरह ढंका, जिससे लू का थपेड़ा कम से कम पड़े और अपने मुंह-कान को बिना ढंके वह रिक्शे पर बैठ गया। उसके सिर पर पहले से ही एक टोपी पड़ी थी। रिक्शा चल पड़ा। रेल की भीड़भाड़ और बस की चिल्लपों से अलग रिक्शे की आरामदायक यात्रा से पम्मी और प्रखर चहक उठे। सिम्मी को भी खूब मजा आने लगा। वे तीनों चिल्लाने लगे। मम्मी ने उन्हें मना किया। रिक्शेवाला कहने लगा, ‘लू चल रही है अम्मा, बच्चों के सिर को ढंक दो।’
मम्मी खीझने लगीं, ‘सिम्मी और प्रखर, तुम्हारी टोपियां कहां हैं? बस में ही भूल गए क्या? चलो, अब लू खाते चलो।’ और उन्होंने पम्मी के सिर को अपने आंचल से ढंक दिया।
रिक्शेवाला कहने लगा, ‘अम्मा, मैं एक नया तौलिया खरीदकर ले जा रहा हूं, जरूरत हो, तो बच्चों को दे दो।’ मम्मी खिसिया गईं, ‘तुम बाबा, अपने रिक्शे पर ध्यान लगाओ।’ सिम्मी गौर से देखने लगी, रिक्शेवाले का पूरा शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था। माथे का पसीना जमीन पर चू रहा था। सिम्मी ने पूछा, ‘रिक्शेवाले, तुम्हारे पैरों में जूते क्यों नहीं हैं?’
रिक्शेवाले ने बताया, ‘बेबी, रिक्शे में चप्पल चलते नहीं और जूते मैं खरीद नहीं सकता।’ ‘जूते क्यों नहीं खरीद सकता?’ सिम्मी ने हैरानी से पूछा। ‘परिवार के भरण-पोषण में कुछ बचता ही नहीं।’ रिक्शेवाले ने कहा।
सिम्मी कुछ और बोलना चाह रही थी, पर मम्मी ने डांटकर उसे चुप करा दिया, ‘सिम्मी, ज्यादा मत बोलो, गला सूख जाएगा।’ मोटर की फट्-फट् आवाज सुनकर प्रखर चिल्ला उठा, ‘गन्ना रस।’ मम्मी ने रिक्शा रुकवा दिया। पम्मी को लेकर वह रिक्शे से उतर पड़ीं। पीछे-पीछे सिम्मी और प्रखर भी उतर पड़े। मम्मी ने पम्मी और प्रखर के लिए मैंगो जूस और सिम्मी के लिए गन्ने के रस का ऑर्डर दिया। सिम्मी ने पूछा, ‘मम्मी और तुम क्या पिओगी?’ ‘कुछ नहीं।’ कहकर मम्मी पर्स से पैसे निकालने लगीं।
सिम्मी ने देखा, रिक्शेवाला रिक्शे पर ही बैठा था और माथे का पसीना पोंछ रहा था। सिम्मी ने फिर पूछा, ‘और रिक्शेवाले को?’ मम्मी ने अनसुना कर दिया। सिम्मी कहने लगी, ‘मम्मी, मैं अपना गन्ना रस रिक्शेवाले को दे दूं? मुझे यह अच्छा नहीं लगता।’
मम्मी ने सिम्मी को चुपचाप पी जाने का आदेश दिया। सिम्मी ने मम्मी के आदेश का पालन किया। मम्मी आकर रिक्शे पर बैठ गईं। पीछे-पीछे सिम्मी और प्रखर भी। रिक्शेवाला पानी पीने जाने लगा। मम्मी गुस्साईं, ‘तुम भी, इतनी देर से खड़े रहे और अब पानी पीने जा रहे हो। अरे बाबा, जल्दी करो।’ रिक्शेवाले ने झटपट गटागट पानी पिया और दौड़ते हुए रिक्शे के पास पहुंचा।
रिक्शा चल पड़ा। मम्मी के व्यवहार से सिम्मी हैरान थी, ‘मम्मी तो ऐसी नहीं थीं। घर आने वाले मेहमानों की वह बहुत खातिरदारी करती हैं। नए-नए पकवान बनाने में घंटों लगा देती हैं। मेहमानों को ‘थोड़ा-सा और’ कह-कहकर खिलाती हैं। रिक्शेवाला हमारा कोई नहीं, लेकिन वह हमें बिठाकर घर ले जा रहा है। खुद धूप में बैठा है और उसने हमारे लिए छाया कर रखी है। सगा होने के लिए इतना क्या कम होता है?’ सिम्मी ने देखा, रिक्शा उसके घर के ठीक सामने खड़ा था। प्रसन्नता से वह चिंहुक पड़ी। प्रखर दौड़ते हुए घर की ओर जाने लगा। रिक्शेवाले ने दोनों बैग उतारकर Êामीन पर रख दिए। मम्मी पर्स में से दस रुपए निकालकर रिक्शेवाले को देने लगीं।
रिक्शेवाला बोला, ‘यह क्या अम्मा, आप तो आधा किराया भी नहीं दे रहीं।’ मम्मी गुस्साईं, ‘तुम लोग ना, लोगों की मजबूरी का फायदा उठाना अच्छी तरह जानते हो। इतना काफी है, रखना है, तो रख लो। इससे एक पैसा भी ज्यादा नहीं दूंगी।’ रिक्शेवाले ने रिक्शे का हैंडल पकड़कर कहा, ‘अम्मा, मैं तो एक भी पैसा नहीं लेता, लेकिन अपने घर से इतनी दूर आ गया हूं, इसलिए ले रहा हूं। अब आप दस रुपए से एक पैसा भी ज्यादा नहीं दे रही हैं, तो मैं भी कुछ नहीं लूंगा।’ वह जाने लगा।
सिम्मी दौड़ती हुई घर पहुंची और उल्टे पांव वापस आई। उसके हाथ में मिट्टी की गुल्लक थी। रिक्शेवाला दूर जा चुका था। सिम्मी ने चिल्लाकर उसे रोका, ‘ए रिक्शेवाले, रुको।’ रिक्शा रुक गया।
सिम्मी दौड़कर पास पहुंची, ‘आपको कितना देना है?’ रिक्शेवाले ने इंकार कर दिया, ‘अरे जाने दो बेबी। मैंने बोल दिया ना, एक भी पैसा नहीं लूंगा।’ ‘ऐसे कैसे नहीं लेंगे।’ कहते-कहते सिम्मी ने अपनी गुल्लक जमीन पर पटक दी। सिक्के जमीन पर बिखर गए। सिम्मी गिनकर पूरे तीस रुपए रिक्शेवाले को देने लगी, ‘इतना ही होता है ना आपका मेहनताना?’
रिक्शेवाले ने चुपचाप पैसे रख लिए। वह सिर झुकाकर जाने लगा। सिम्मी ने फिर उसे आवाज दी, ‘रिक्शेवाले रुको।’ रिक्शेवाले ने पीछे मुड़कर देखा। सिम्मी दौड़कर उसके पास आ रही थी। उसने रिक्शेवाले को पांच रुपए का सिक्का और थमा दिया, ‘रास्ते में गन्ने का रस पी लेना।’ सिम्मी पीछे मुड़कर अपने घर की ओर जाने लगी। कुछ दूर चलने के बाद पीछे मुड़कर उसने देखा।
रिक्शा चल पड़ा था।