शिक्षा के लिए
दिनेश दपर्ण Saturday, September 19, 2009 02:16 [IST]  


सोनू बहुत ही सीधा, सरल व विनम्र लड़का था तथा उसके सब दोस्त भी अच्छे और सभ्य परिवार के सदस्य थे। फर्क था तो केवल इतना कि सोनू गरीब मां का बेटा था और उसके दोस्त अच्छे खाते-पीते परिवार से थे। उन्हें रोÊाना विद्यालय जाने से पहले जेबखर्च के लिए पैसे मिलते थे मगर बेचारे सोनू को पैसे खर्च करने के लिए रोज रोज कौन पैसे देता? पिता की तो बहुत पहले ही मृत्यु हो गई थी, मेहनत-मज़दूरी करके जैसे-तैसे उसकी मां उसे पढ़ा-लिखा भी रही थीं और अपने घर का खर्च भी चला रही थीं, फिर भी वह सोनू को थोड़े-बहुत पैसे जेबखर्च के लिए कभी-कभी दे दिया करती थीं।



सोनू उन पैसों को फालतू खर्च से बचाकर पेन, पेंसिल, कॉपियां, पुस्तकें आदि पढ़ने-लिखने की सामग्री खरीद लिया करता था। वह अपनी मां की मजबूरी समझता था, इसलिए उसके पास अपने दोस्तों के साथ खर्च करने के लिए पैसे नहीं बचते थे। सोनू की परिस्थिति से उसके सब मित्र परिचित थे। जैसे ही लंच ब्रेक होता, उसे अपने साथ कैंटीन में ले जाते थे और वहां सब बैठकर प्रेम से मिल-जुलकर खाते थे। यह उनका रोÊा का नियम था। सोनू खुद पैसे न चुका पाने के कारण उनसे कतराकर अलग रहना चाहता था, पर वे सब उसे अलग-थलग रहने का मौका ही नहीं देते थे। वे सब जानते थे कि सोनू स्वाभिमानी मां का स्वाभिमानी बेटा है, वह कभी भी दूसरों के पैसों से नहीं खाएगा।



एक दिन जब वह विद्यालय से घर वापस लौटा, तो उसका मुंह उतरा हुआ था। उसे निराश देखकर मां ने पूछा, ‘बेटा, क्या बात है? आज तू बहुत उदास लग रहा है। क्या किसी दोस्त से झगड़ा हुआ है? या फिर तबीयत खराब है?’ सोनू मां को बिना जवाब दिए चुपचाप अपने कमरे में जाने के लिए उठा, पर मां ने प्यारभरा हाथ सोनू की पीठ पर फेरकर फिर से वही बात पूछी, तो उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह रुंधे हुए गले से बोला, ‘मां आप सुनकर दुखी हो जाएंगी, इसलिए मैं कुछ बताना नहीं चाहता था, पर..’ कुछ देर रुककर उसने आगे कहा, ‘मां, मेरे सारे दोस्त मुझे लंच ब्रेक में कैंटीन ले जाकर खिलाते-पिलाते हैं। मगर मैं कभी-भी उन पर खर्च नहीं कर पाता। मैंने उनसे बचने की कोशिश भी की, पर वे मुझे कभी अकेला छोड़ते ही नहीं हैं। मैं अपने घर की हालत भी जानता हूं और आप कितने कष्ट उठाकर मुझे पढ़ा रही हैं, यह बात भी अच्छी तरह समझता हूं।’



मां ने उससे हंसते हुए कहा, ‘बस, इतनी सी ही बात है न। कल विद्यालय से वापस घर लौटते समय अपने सभी दोस्तों को घर लाना, मैं उन्हें सब समझा दूंगी। अब झटपट हाथ-मुंह धोकर आओ, खाना ठंडा हो रहा है।’ सोनू का मन अब हल्का हो चुका था। वह खाकर कुछ देर खेलने के लिए बाहर चला गया।’



दूसरे दिन विद्यालय से लौटते समय सोनू अपने सभी दोस्तों को घर ले आया। सोनू की मां ने सबको स्नेहपूर्वक चटाई पर बिठाया, कुछ नाश्ता करवाया। जब सब खा चुके, तो सोनू की मां ने उन्हें समझाया, ‘बच्चों, सबसे पहले तो मैं तुम सब लोगों को शाबाशी देना चाहूंगी कि तुम दोस्ती को अमीरी या गरीबी से नहीं तौलते। बड़ी अच्छी बात है कि तुम लोग विद्यालय में हिल-मिलकर स्कूल कैंटीन में खाते-पीते हो।



खाना-पीना बुरी बात नहीं है, मगर रोÊा-रोÊा कैंटीन में खाने से एक तो तुम्हारा स्वास्थ्य खराब होगा और दूसरी बात तुम्हारी आदत भी बिगड़ेगी। शायद तुम लोगों को पता नहीं है कि आर्थिक तंगी के कारण हमारे नगर व मोहल्लों में अनेक बच्चे अपनी पढ़ाई या तो बीच में ही छोड़ देते हैं या फिर विद्यालय का मुंह ही नहीं देख पाते और मेहनत-मÊादूरी करने लगते हैं। वे बाल श्रमिक बन जाते हैं। यदि तुम अपने जेबखर्च से रोÊा थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर व अपने अन्य साथियों से पैसा इकट्ठा कर एक निर्धन छात्र सहायता क्लब बनाओ, जो निर्धन बच्चों की मदद कर उनकी शिक्षा पूरी करने में मदद करें, इससे बढ़कर और कोई दूसरा अच्छा कार्य नहीं है, ‘इसीलिए कहा गया है - विद्यादान महादान।’



सोनू के सब मित्रों को उसकी मां की बात सही और अच्छी लगी। कुछ दिनों के अंदर ही सोनू के मित्रों ने निर्धन छात्र सहायता क्लब की स्थापना की। वे सब मिलकर प्रतिदिन अपने जेबखर्च से पैसे बचा-बचाकर क्लब में जमा कराने लगे और कई अन्य सदस्य भी बनाए गए, जिससे तेÊाी से धन जमा होने लगा।
जब सोनू और उसकी मित्र मंडली के इस कार्य की खबर उनके शिक्षकों को लगी, तो उन्होंने उन बच्चों की भरपूर मदद की। उनके इस सहायता क्लब से मदद पाकर आज नगर के कई निर्धन छात्र अपनी शिक्षा पूरी करने के महायज्ञ में जुटे हुए हैं। हालांकि सोनू अब शिक्षक है और उसके मित्र भी ऊंचे-ऊंचे पदों पर रहकर कार्य कर रहे हैं और अपने वेतन से अब भी हर माह नियमित रूप से धन जमा करा रहे हैं।

 
 


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