बालसखा सबके मन मे है
bhaskar Saturday, September 19, 2009 02:33 [IST]  


हर शिष्य चाहता है कि वह अपने गुरू के लिए हर वो काम करे, जिससे गुरू का सिर गर्व से ऊंचा हो जाए। यहां एक गुरू ने ऐसी मिसाल कायम की, जिससे वे हर शिष्य के मन में बस गए। शिष्यों से गुरुदक्षिणा में उन्हें एक प्यारा-सा नाम मिला- बालसखा।



लंच ब्रेक के बाद शर्मा सर क्लास लेने आए। सारे बच्चों ने उन्हें शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं दीं। शर्मा सर ने छात्रों को सम्बोधित किया, ‘छात्रो, आपने अक्सर कहानियों में मास्टर साहब या मासाब केबारे में सुना होगा। साइकिल पर सफेद कुर्ते-पायजामे के ऊपर भूरे रंग की जैकेट पहने, चश्मा लगाए, कपड़े का एक बैग टांगे हुए जिसमें कुछ किताबें होती थीं, एक व्यक्ति स्कूल आते थे। जो हर छात्र केपसंदीदा शिक्षक होते थे। ऐसे मास्टर साब कभी-कभी किताबों-कहानियों से निकलकर भी आ जाते हैं।



उनमें एक शिक्षक के बारे में मैं आपको आज बताऊंगा। आज शिक्षक दिवस के मौके पर आपका परिचय ऐसे शिक्षक से करवाना चाहता हूं, जो उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में रहते थे। वे पहाड़ी इलाके के छोटे से गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते थे। इनका नाम है- हेमराज भट्ट। बच्चे इन्हें बालसखा कहते थे।’ तभी बीच में राम बोल पड़ा, ‘सर, हेमराज जी को सब बालसखा क्यों कहते थे? बालसखा का मतलब क्या होता है?’



शर्मा सर ने बताया, ‘बालसखा का मतलब है- बचपन का साथी। यानी बच्चों के हर सुख-दुख को बहुत अच्छी तरह समझ जाने वाला साथी। बालसखा बच्चों के बारे में बच्चों की जगह खुद को रखकर ही सोचते थे। वे दुनिया को उनकी नÊार से देखते थे। यही वजह है कि बालसखा मानते थे कि स्कूल, बाग-बगीचे, परिवहन के साधन ये सबके सब बच्चों को ध्यान में रखते हुए ही बनाए जाएं। हेमराज का मानना था, स्कूल जाने वाली बसों की सीटें और पकड़ने वाले हैंडल भी बच्चों के हिसाब से बनाने चाहिए।



प्राथमिक स्कूल में पढ़ाते हुए उन्होंने बच्चों को केंद्र में रखकर ही हर तरह का ताना-बाना बुना था। हिमालय के जिस इलाके में वे रहकर पढ़ाते थे, वहां स्कूल में बच्चों के बैठने की व्यवस्था उचित नहीं थी। यह तो आप जानते ही हैं कि हिमालय में दांत बजने वाली ठंड पड़ती है। ऐसे में स्कूल में बच्चों को फर्श पर काफी ठंडी लगती है। हेमराज से यह देखा नहीं गया और उन्होंने रात-रातभर बैठकर बच्चों के लिए अपने हाथों से गद्दियां बुनी थीं।



बालसखा शिक्षकों के सच्चे दोस्त थे, वे बच्चों की मानसिकता को पढ़ने में माहिर थे। उन्होंने ठेठ पहाड़ी में बसे एक शिक्षकीय विद्यालय में बच्चों को उनके सामाजिक सरोकारों को केंद्र में रखकर शिक्षण दिया। दुबली-पतली कद-काठी के हेमराज उत्तराखंड के पहले शिक्षक कहे जा सकते हैं, जो पिछले कुछ वर्षो से अपनी डायरी लिखते आए थे। उनके द्वारा लिखी गई डायरी के कुछ अंश ‘टीचर्स पोर्टल’ नामक वेबसाइट पर भी देखे जा सकते हैं।



यदि हम उनकी डायरी के पन्नों पर नÊार डालें, तो उसमें एक शिक्षक का साहस और सूझ-बूझ दोनों एकसाथ मिलेंगे। बालसखा कहानीकार भी थे। उन्होंने बच्चों के लिए अनेक कहानियां भी लिखी हैं। हाल ही में उनकी एक कहानी की पुस्तक का प्रकाशन भी हुआ है। बालसखा न सिर्फ बहुत अच्छे गुरू थे, बल्कि बहुत अच्छे इंसान भी थे।’
राम - ‘सर, हम हेमराज जी से मिलना चाहते हैं। वे कब आएंगे यहां?’
सर -‘बच्चों, अब कोई उनसे नहीं मिल सकता। वे हमें छोड़कर जा चुके हैं।’

 
 


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