किफायती सरकार और मंगू के हसीन सपने
देवेंद्र कुमार गुप Tuesday, September 22, 2009 00:42 [IST]  

आज मंगू बहुत खुश था। वह छह महीने पहले ही अपने गांव से शहर आया था। आज उसने गलती से अपने ठेकेदार के यहां टीवी देख लिया था। हालांकि उसे ‘बिजनेस क्लास’ और ‘इकोनॉमी क्लास’ जैसे शब्द तो पल्ले नहीं पड़े, लेकिन जो समझ में आया, उससे उसने यही अर्थ निकाला कि सरकार किफायती हो रही है, पैसे बचा रही है। अब उसकी किस्मत बदल जाएगी। उसे याद है, कुछ महीने पहले उसके गांव में सरकार की एक योजना में उसने सौ-सवा सौ दिन काम किया था।



जब उससे 100 रुपए के सामने अंगूठा लगवाकर 80 रुपए ही दिए गए तो उसने डरते-डरते पूछा था, ‘मालिक, ये 80 रुपए ही क्यों?’ तब उस सफारी सूट पहने आदमी ने हंसते हुए कहा था, ‘अभी सरकार के पास पैसों की किल्लत चल रही है, जो मिल रहा है, वही रख ले।’ तब मंगू को सरकार की हालत पर बहुत दया आई थी। अब वह प्रसन्न है। जब सरकार अपने खर्च घटाएगी तो गांव में उस जैसे लोगों को पूरे पैसे मिलेंगे। आज वह इतना खुश था कि पांच महीने में पहली बार पाव भर दाल लाया और अपने चारों बच्चों को खिलाई। उसे भरोसा है कि अब सब ठीक हो जाएगा और उसके बच्चों को हर महीने दाल खाने को मिलेगी।



दो महीने पहले मंगू ने अपने बच्चांे को स्कूल से निकाल लिया था, क्योंकि बच्चे स्कूल का खाना खाकर बीमार पड़ने लगे थे। उसने तभी ठान लिया था कि घर का बासी खाना ज्यादा अच्छा, स्कूल के इस भोज से। फिर उसने यह भी सोचा कि उसके दोनों बेटे बड़े हो गए हैं, ज्यादा पढ़कर क्या करेंगे! काम करेंगे तो घर में पैसा तो आएगा। तभी से वे चायवाले की दुकान पर काम कर रहे हैं। लेकिन अब जब सरकार पैसे बचा रही है तो बचे हुए पैसे स्कूलों में लगाएगी ही, भोजन का स्तर भी सुधरेगा। और फिर उसका ठेकेदार भी उसे पूरे पैसे देना शुरू कर देगा। तो क्यों न बच्चांे को फिर से स्कूल में डाल दिया जाए!



यही विचार करते-करते वह रेलवे लाइन के पास स्थित अपनी झोपड़ी के बाहर खटिया पर लेट गया। मच्छरों की फौज के बीच उसे याद आया कि इस बार मच्छर मारने वाले अफसर भी नहीं आए। वाकई पैसों की कितनी तंगी आ गई! अब सरकार अपने खर्च घटा रही है तो मच्छर मारने वाली दवा जरूर भेजेगी। वैसे अब तो उसे इसकी आदत भी हो गई है। कभी-कभी ठंडवाला बुखार आ जाता तो सरकारी अस्पताल जाकर दवाई ले आता, ठीक हो जाता।

बस, दो माह पहले ही हालत थोड़ी खराब हो गई थी तो उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। तब उसको पता चला था कि बेचारी सरकार के पास पैसों की कितनी कमी है। उसे तीन दिन जमीन पर ही लेटना पड़ा था। अस्पताल में सलाइन भी नहीं थी। वह तो भला हो अस्पताल के बाबू का, जिसने आधी कीमत में कहीं से सलाइन लाकर दे दी थी। चलो अब सरकार अपने खर्च कम कर रही है तो इससे अस्पतालों को पैसा मिलेगा।



और फिर मच्छरों के बीच ही उसे नींद आ गई। सपने में उसने देखा कि सारी रेलगाड़ियां उसकी झोपड़ी के पास आकर रुक रही हैं। नेता जैसे कुछ लोग उसकी ओर आ रहे हैं। उनके हाथों में खिलौने, मिठाइयां, अच्छे-अच्छे कपड़े हैं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसे याद आया कि साल भर पहले भी तो सफेद खादी पहने कुछ लोग उसके गांव की झोपड़ी में आए थे। एक ने तो हाथ जोड़कर पैर भी पड़े थे। उसने अपना वोट उसी को दिया था।



मंगू के होठों पर मुस्कान थी। ऊपर आसमान पर सितारे चमक रहे थे, नीचे जमीन पर मच्छर भिनभिना रहे थे।

 
 


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