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क्या चीनी ड्रैगन भारत को निगल जाएगा?
वेंकटेशन वेंबू Sunday, September 27, 2009 00:27 [IST]  

Banbuइन दिनों जो भी भारतीय अखबार के पन्ने पलट रहा है या टीवी चैनलों पर आंखें गड़ाए हुए है, उसे इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए माफ किया जा सकता है कि हमारा देश ऐसे मुहाने पर खड़ा है, जहां उसे आग उगलते ड्रैगन द्वारा निगला जा सकता है। भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के साथ ही भारतीय मीडिया चीन की आक्रामकता को दर्शाने के लिए ड्रैगन को रूपक के तौर पर दर्शाने मंे आनंद का अनुभव कर रहा है। वहीं भारत को बाघ या हाथी के रूप में दर्शाया जा रहा है।



अगर हम पश्चिम के दर्शन मंे वर्णित ड्रैगन (जिसे कि हमने बगैर सोचे-समझे उधार ले लिया है) के अनुसार चलें तो यह उस देश को वर्णित करने के लिए पर्याप्त है, जो लगातार ‘आग उगलता’ और हमेशा डराने-धमकाने की मुद्रा अख्तियार किए रहता है। लेकिन यदि इसे चीन की संस्कृति में वर्णित ड्रैगन के रूप में देखें तो ड्रैगन को चीनी ‘खतरे’ के तौर पर दिखाने का यह विचार बुनियादी रूप से ही गलत है। पश्चिम के ड्रैगन के उलट चीन का ड्रैगन न तो आग उगलता है और न ही यह बुराई की विध्वंसकारी ताकत का प्रतीक है। इसके बजाय यह सद्भावना, आध्यात्मिक शक्ति, बुद्धिमत्ता और संस्कृति से संबद्ध है, जो लोगों के लिए समृद्धि और भाग्य लाता है।



dragonचीन में कई लोग और कंपनियां अपने नाम के साथ ‘लांग’ जोड़ते हैं जो ड्रैगन का प्रतीक है। कोई भी पर्व या सार्वजनिक कार्यक्रम पवित्र ड्रैगन डांस के बगैर अधूरा है। कुछ साल पहले चीन के बुद्धिजीवी समाज ने ड्रैगन को देश के राष्ट्रीय प्रतीक के तौर पर बनाए रखने के मसले पर चर्चा छेड़ी थी। कई लोगों का कहना था कि इससे खासकर पश्चिम में ड्रैगन के प्रति जो नजरिया है, उससे चीन की युद्धोन्मादी देश की छवि बनती है। लेकिन जनता के एक बड़े वर्ग की यही राय थी (ऐसा ऑनलाइन पोल से स्पष्ट हुआ) कि ड्रैगन को चीनी प्रतीक के रूप में बनाए रखा जाना चाहिए, क्योंकि यह सम्पन्नता और अच्छे भाग्य का प्रतिनिधित्व करता है।



लेकिन हम हर देश के साथ इसी तरह का व्यवहार नहीं करते। उदाहरण के लिए अमेरिका का राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न् बाज है, जबकि पाकिस्तान का चिह्न् पश्चिमी हिमालय में पाई जाने वाली बकरी, लेकिन जब भी इनका उल्लेख होता है, हम इन्हें इनके प्रतीक चिह्नें के साथ प्रस्तुत नहीं करते। चीन के लिए ड्रैगन को रूपक बनाने में एक समस्या यह भी है कि यह केवल एक आयाम को प्रस्तुत करता है, जो चीन जैसे बहुआयामी देश के साथ न्याय नहीं करता है। चीन के आर्थिक और भू-राजनैतिक रूप से उभरने की वजह से न केवल भारत, बल्कि कई अन्य देशों को उससे बेचैनी होती है, लेकिन सच तो यह है कि वहां के कुछ सैन्य फितरती दिमागों को छोड़ दें तो अधिकांश चीनी भारत को विखंडित करने या अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के बारे में नहीं सोचते हैं।



ऐसे में हमें जरूरत चीन के लिए कोई वैकल्पिक रूपक तलाशने की है। यह रूपक ऐसा होना चाहिए, जो जटिल, बहुआयामी व तेजी से बदलते चीनी समाज, वहां की उभरती अर्थव्यवस्था और राजनीतिक तंत्र के साथ न्याय कर सके।



वेंकटेशन वेंबू
लेखक डीएनए
के विदेश
संवाददाता हैं।

 
 


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