विज्ञापनों के पैकेजों में अक्सर रियो डी जनेरियो व म्यूनिख महिमामंडित होते नजर आएंगे, लेकिन अगर उत्सव की बात हो तो कोई भी देश भारत के सामने नहीं टिकेगा। दूसरे भले ही सप्ताहांत में पार्टी मना लें, लेकिन जब भारतीय उत्साह में आते हैं तो दस दिन तक सोने का नाम नहीं लेते।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम भारतीय धर्म के नाम पर ही उत्सव मनाते हैं, लेकिन यदि भारत में धर्म को हटा दिया जाए तो यहां बचेगा क्या! हम देवताओं के सम्मान में जुआ तक खेल लेते हैं। हम छुट्टियां लेकर धार्मिक तीर्थो पर जाते हैं। हमारे देश में धर्म का प्रभाव इसलिए इतना ज्यादा है क्योंकि हमने उस पर भी मनोरंजन का मुलम्मा चढ़ा दिया है, फिर चाहे गणपति की पूजा हो या फिर मां दुर्गा की पूजा।
हमारे यहां उत्सव कई-कई दिन चलते हैं, हर्ष व उल्लास मित्रों और परिवार के साथ साझा किया जाता है। दुर्गा पूजा के समय तो कोलकाता सामुदायिक स्नेह में उमड़ता एक शहर बन जाता है। लंदन और न्यूयॉर्क भी दावा कर सकते हैं कि क्रिसमस से लेकर न्यू ईयर सेलिब्रेशन तक वे भी कहीं रुकते नहीं हैं। लेकिन इसमें बड़ा भारी अंतर है। पश्चिम में प्रत्येक घर जीवित हो उठता है, लेकिन शहर चुप्पी साध लेते हैं। किंतु दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता में घर और शहर आपस में एकाकार हो जाते हैं। यदि आपने बंगाल में दुर्गा पूजा का अनुभव नहीं किया है तो इसका मतलब है कि आप एक मानव आश्चर्य से वंचित रह गए। प्रणब मुखर्जी और ममता बनर्जी ‘दुर्गा पूजा’ के दौरान घर के सिवाय और कहीं भी नहीं मिलेंगे। यहां तक कि बुद्धदेव भट्टाचार्या जैसे साम्यवादी नास्तिक भी दुर्गा पूजा में मुस्कराते होंगे।
रोम इस बात पर इतरा सकता है कि धार्मिक पर्यटन का वह अद्वितीय गंतव्य है। वहां आने वाले पर्यटकों को रोम के पत्थरों पर पश्चिम के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास की झलक देखने को मिलती है। दुर्गा पूजा की कला अज्ञात प्रतिभाओं का प्रदर्शन होती है। दुर्गा की प्रत्येक छवि श्रद्धा व आराधना के साथ बनाई जाती है। कुमारतुली के कलाकार जानते हैं कि देवियों की प्रतिमाएं नदियों में चली जाएंगी, वैसे ही जैसे हम सभी को एक दिन जाना है। रोम संगमरमर के पत्थरों को संरक्षित करता है, कोलकाता क्षणों को।
हम भले ही नेताओं के विचारों को ज्यादा अहमियत नहीं देते हों, लेकिन अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र के नेताओं को भी नागरिक होने के नाते ‘हैप्पी दिवाली’ का अधिकार है ही। यहां होने वाले विधानसभा चुनावों में खड़े होने वाले उम्मीदवारों में से कम से कम आधे तो हारेंगे ही। वे यह जानते हैं कि केवल कुछ अक्खड़ किस्म के उम्मीदवार ही अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होंगे। इसलिए सभी राजनीतिक दल उस समय बेहद खुश हुए, जब चुनाव आयोग ने नतीजे २२ अक्टूबर को घोषित करने का एलान किया। जब यह बात सामने आई कि चुनाव परिणाम पहले घोषित किए जा सकते हैं तो राजनीतिक दलों ने आयुक्तों से दिवाली के बाद ऐसा करने का आग्रह किया। कोई भी अपनी दिवाली खराब करना नहीं चाहता था।
चुनाव से पहले खुशियां बांटने का एक तरीका यह है कि अपने चाटुकारों को, जिन्हें कि ‘पार्टी कार्यकर्ता’ कहा जाता है, नकदी दे दी जाए। ये पार्टी कार्यकर्ता उसी दिन से अपनी खैरात बंटोरना शुरू कर देते हैं, जिस दिन उम्मीदवार अपना नामांकन पत्र भरता है। वह कार्यकर्ता उसका एक हिस्सा वोटरों पर खर्च करता है, जबकि शेष राशि अपने भले के लिए रख लेता है। मुंबई की शराब की दुकानों में शराब की बिक्री का ग्राफ २५ सितंबर से चढ़ना शुरू होगा और १२ अक्टूबर तक यह लगातार प्रगति करता जाएगा (महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में २५ सितंबर को नामांकन पत्र भरने का आखिरी दिन था, जबकि मतदान १३ अक्टूबर को होगा)। यदि आबकारी विभाग बार मालिकों से इसका स्पष्टीकरण मांगता भी है तो वे कह सकते हैं कि यह दिवाली की वजह से है। गौरतलब है कि मुंबई के आबकारी विभाग के आदेशानुसार चुनाव तक प्रत्येक बार को अपनी दैनिक बिक्री के आंकड़े विभाग को बताने होंगे।
आम जनता के बीच शराब बांटने का कार्य बार के जरिए नहीं होता है। बार शराब पर काफी अधिक पैसा वसूलते हैं। किसी भी उम्मीदवार के पास व्यर्थ उड़ाने के लिए पैसा नहीं है। शराब की बोतले थोक में खरीदी जाती हैं और शाम के धुंधलके मंे बांटी जाती हैं। इसलिए आबकारी विभाग को खुदरा शराब व्यवसायियों की नहीं, बल्कि थोक विक्रेताओं की पड़ताल करनी चाहिए।चुनाव की वजह से महाराष्ट्र और हरियाणा में दिवाली थोड़ी जल्दी ही आ जाएगी। हममें से कई लोग हमारी प्रणाली को ‘दिवाला लोकतंत्र’ कहते हैं, लेकिन मेरा अब भी इस पर विश्वास बना हुआ है। हैप्पी दिवाली डेमोक्रेसी!
लेखक पाक्षिकपत्रिका ‘कोवर्ट’ के चेयरमैन हैं।