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जिनकी है सत्ता उन्हीं के श्रम कानून भी!
गुरचरन दास Sunday, September 27, 2009 00:49 [IST]  

Gurusharanकांग्रेसी नेता संजय निरुपम ने जब पिछले सप्ताह जेट एयरवेज के राष्ट्रीयकरण की मांग उठाई तो उससे भारत के हवाई यात्रियों को निराशा हुई होगी। इससे १९९१ से पहले के उन बेहद कष्टप्रद दिनों का जिन्न सामने आ खड़ा हुआ, जब आकाश पर भारतीय एयरलाइंस का एकाधिकार हुआ करता था। जैसी कि निरुपम ने मांग की है, यदि उस पर अमल होता है तो उससे जेट दुनिया की श्रेष्ठ एयरलाइन से बदतर एयरलाइन में बदल जाएगी।



जेट एयरवेज में दिक्कतों की शुरुआत तब हुई, जब उसके कुछ पायलटों ने यूनियन बनाने की कोशिश की। प्रबंधन ने इसकी अनुमति नहीं दी और उनके दो नेताओं को निकाल दिया। इसके जवाब में अन्य पायलट ‘सामूहिक अवकाश’ पर चले गए, जिसकी वजह से हजारों मुसाफिर फंस गए। यह ऐसे वक्त हुआ, जब पिछली तिमाही में जेट को २क्क् करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है।
यूनियन बनाने का अधिकार लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन क्या तीन से चार लाख रुपए हर महीने कमाने वाले पायलटों की तुलना गरीब श्रमिकों से की जा सकती है? सार्वजनिक परिवहन में जरूरी सेवा देने वाले सेना, पुलिस और अस्पतालों में कार्यरत लोगों को क्या सेवाओं को अस्त-व्यस्त करने की अनुमति दी जा सकती है?



Jetजेट एयरवेज के इस प्रकरण ने हमारे बाबा आदम के जमाने के श्रम कानूनों पर पुनर्विचार करने का मौका मुहैया करवाया है। ये कानून पायलट जैसे केवल १क् फीसदी अभिजात्य श्रमिकों के हितों का ही संरक्षण करते हैं, जबकि ९क् फीसदी श्रमिकों के प्रतिकूल हैं। निश्चित रूप से श्रम कानून जरूरी हैं, लेकिन वे ऐसे होने चाहिए जो नौकरियों का नहीं, श्रमिकों का संरक्षण करें। सभी सरकारें नौकरियां बचाने की कोशिश करती हैं, लेकिन वे कभी भी सफल नहीं होतीं। कंपनियों को बाजार की विभिन्न स्थितियों में काम करना पड़ता है।



आर्थिक सुस्ती के दौर में ग्राहकों के ऑर्डर कम हो जाते हैं और ऐसे में एक कंपनी के सामने यही चारा रह जाता है कि वह या तो अपने
कर्मचारियों की संख्या में कटौती करे या फिर दिवालिया होने के लिए तैयार रहे। स्कैन्डिनेविया जैसे देशों में नियोक्ताओं को बाजार की स्थिति के मुताबिक कर्मचारियों की छंटनी करने की छूट रहती है। वे नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों की ‘बेरोजगारी बीमा’ इत्यादि के माध्यम से रक्षा करते हैं। भारत के श्रम कानून इसके उलट हैं। वे नौकरियों का संरक्षण करते हैं, कर्मचारियों का नहीं। इससे कंपनियों को मंदी में भी छंटनी की अनुमति नहीं होती। इसलिए वे स्थाई कर्मचारियों की नियुक्ति से बचती हैं।



इसके समाधान के कई रास्ते हंै। प्रथम, इसके लिए शुरुआत छंटनी के बदले में मिलने वाली राशि के साथ की जा सकती है। अभी छंटनी करने पर कर्मचारी को प्रत्येक साल के हिसाब से १५ दिन के वेतन के बराबर राशि देने का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर ४५ या ६क् दिन किया जा सकता है। दूसरा, प्रॉवीडेंट फंड के नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि नौकरी जाने की स्थिति में कर्मचारी सेवानिवृत्ति के खाते से पैसे निकाल सकें। तीसरा, प्रॉवीडेंट फंड में योगदान की राशि बढ़ाई जानी चाहिए ताकि नौकरी खोने वाले व्यक्ति को आसानी से ऋण उपलब्ध करवाया जा सके। चौथा, बेरोजगार श्रमिकों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं में शामिल किया जाए और अंतिम, छंटनी से पहले थोड़ा-सा दर्द सभी कर्मचारियों को देना चाहिए, जैसे बड़े अधिकारियों के वेतन में कमी करना।



जेट की हड़ताल ने बताया है कि हम कैसे यह मानकर स्वयं को धोखा देते आ रहे हैं कि हमारे श्रम कानूनों से श्रमिकों का बचाव हो रहा है, जबकि ये केवल अभिजात्य श्रमिकों का ही संरक्षण कर रहे हैं।



गुरचरन दास
लेखक प्रॉक्टर एंड गैंबल इंडिया के चेयरमैन रह चुके हैं।

 
 


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