काया एल्ड्रिज को खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए। दुष्कर्म के बाद वह पुलिस स्टेशन जाने में सफल रही, जहां एक बार फिर उसके साथ दुराचार नहीं हुआ। अमतौर पर उन महिलाओं के साथ यही होता है, जो आदमी के वहशीपन के खिलाफ आवाज उठाने का साहस करती हैं। इम्फाल की इरुमी से पूछो या दाहोद की धानीबेन या झारखंड की किनजी से। इसलिए काया भाग्यशाली थी और जब वह इस हमले के बारे में बताने पुलिस स्टेशन गई तो उसे सफेद चमड़ी के कारण पुलिस प्रमुख से मिलने की अनुमति मिल गई।
कुछ हफ्ते पहले आने के बाद से काया एआईईएसईसी में जहां काम करती थी, वहां के लोगों ने भी उसका साथ नहीं दिया। जब पुलिस स्टेशन में उन्हें काया के बयान का तजरुमा करने के लिए बुलाया गया, वे इस तरह के उलझे हुए मामले में और खासकर जिसमें पुलिस भी शामिल हो, उसमें फंसना नहीं चाहते थे। अनुवाद होते ही वे ‘क्या आपको घर छोड़ दें?’ या ‘आप ठीक तो हैं?’ की औपचारिकता निभाकर नदारद हो गए। लेकिन काया को अहमदाबाद में काम करने का अनुभव हो चुका था। इसलिए जिस दिन उन्हें कोर्ट में प्रस्तुत होना था, उस दिन बाकी लोगों ने व्यस्तता का नाटक किया तो यह उनके लिए बहुत अनपेक्षित नहीं रहा होगा।
हिंदुस्तान की निचली अदालत में सिर्फ औरत होना ही पर्याप्त भयानक है। किसी महिला से पूछिए। महिला वकील से भी पूछिए। एक गोरी स्त्री, युवा स्त्री, एक हिंदू देश में पर्दे में न ढंकी हुई स्त्री होना तो और भी भयानक है।काया अकेली थी। उसके साथ सिर्फ १८ साल का एक युवा लड़का था, जो कोर्ट में घुसने से पहले ही कांपने लगा। काया कोर्ट का रास्ता बताने के लिए लगभग उसे अपने साथ पकड़ लाई थी। यह मर्दो का न्यायालय था। चारों ओर घूरते हुए, ठिठोली करते और मजाक उड़ाते हुए मर्द थे। नजदीक आने की कोशिश करते हुए आदमी थे। इधर-उधर चल रही घुसुर-पुसुर और बेमतलब की बातचीत के बीच जब काया कटघरे में खड़ी हुई तो वे मर्द इतने करीब थे कि वह उनकी सांस और गंध को भी महसूस कर सकती थी। मर्द, जिनकी निगाहें मन ही मन उसे निर्वस्त्र कर रही थीं। जब कायर हमलावर ने उसे उंगली चुभाई और हंसा तो लोग मजे ले रहे थे।
जब अभियुक्त के वकील ने काया को अपमानित किया और पूछा कि क्या वह सिगरेट पीती है तो वे सीटियां बजा रहे थे और चिल्ला रहे थे। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने वे सारे मर्द ये हरकतें कर रहे थे। लेकिन काया भाग्यशाली है। जल्द ही वह यह देश छोड़कर चली जाती है। जैसे-जैसे वक्त गुजरता है, वह अपनी देह पर उन गंदे हाथों का दबाव भूल जाती है। लेकिन हमारी उन औरतों का क्या, जिनके साथ रोज हजारों की संख्या मंे बलात्कार होता है, उन्हें छेड़ा जाता है, निर्वस्त्र करके घुमाया जाता है और अपमानित किया जाता है। ऐसे में इन सब कानूनी प्रक्रियाओं का क्या अर्थ है कि काया की भाषा में कानून की व्याख्या की जा रही है, जब न्याय व्यवस्था खुद औरतों को शिकार बनाने के इस खेल मंे शामिल है। क्या उन न्यायाधीशों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए?
मल्लिका साराभाई
लेखिका जानी-मानी नृत्यांगना और समाज सेविका हैं।