दोनों ही मुल्कों में ऐसी तमाम दि़क्क़तें हैं, जिन पर गंभीरता से ग़ौर किया जाए, तो आमजन को सुकून मिले। अफ़सोस है कि ऐसे हालात में दोनों मुल्क हाथ से हाथ मिलाकर काम करने की बजाय दो-दो हाथ करने पर तुले हैं..
आज मैं अपनी बात उदयपुर के चंद्रगुप्त चौहान के जिक्र से शुरू करूंगी। बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी हैं, उन्होंने मुझे एक तस्वीर भेजी है, जिसमें भूख से निढाल हिंदुस्तानी बच्चे नज़र आते हैं और पूछा है कि क्या पाकिस्तान में भी यही हाल है और अगर ऐसा है, तो हम इस भुखमरी से मिल कर क्यों नहीं लड़ सकते।
चंद्रगुप्त जी आपकी इस तस्वीर के जवाब में एक ख़बर पढ़ लीजिए। यह ख़बर पाकिस्तान के किसी गांव की नहीं, सबसे बड़े शहर कराची की है। जैसा कि आप जानते हैं कि रमज़ान पर लोग दान-पुण्य करते हैं। ख़ैरात लेने के लिए दूर-दूर से औरतें, बच्चे और मर्द आते हैं। ऐसी ही एक ख़ैरात पिछले दिनों रमजान के मौक़े पर पुराने कराची के मोहल्ले घोड़ी गार्डन में हो रही थी। राशन बांटने के लिए कूपन दिए जा रहे थे।
वहां एक पतली-सी गली है, जिसमें वो द़फ्तर है, जहां कूपन मिल रहे थे। गर्मी बहुत थी। सैकड़ों औरतें एक-दूसरे पर गिर रही थीं। भूख ने उन्हें मजबूर किया था कि वे अपने जैसी ही दूसरी भूखी औरतों को धक्का देकर आगे बढ़ने की कोशिश करें। टोकन लेने के लिए औरतें सीढ़ियों पर कतार बनाए खड़ी थीं और इमारत के बाहर भी मौजूद थीं। जब भीड़ बहुत बढ़ गई, तो सीढ़ियों के साथ शटर को बंद कर दिया गया, ताकि जो औरतें अंदर हैं, उन्हें टोकन जारी कर दिए जाएं।
इस दौरान बेहद गर्मी और उमस में सीढ़ियों पर खड़ी औरतें टोकन लेने की कोशिश कर रही थीं, जिसमें अचानक भगदड़ मच गई। जिससे कई औरतें सीढ़ियों से नीचे की तरफ़ फ़िसलीं और साथ में दूसरी कई औरतों को भी लेकर गिरीं, जिससे नीचे की कतार में खड़ी हुई कई औरतें दब गईं और बेहोश हो गईं। उनमें से लड़कियों समेत 18 औरतें कुचले जाने और दम घुटने की वजह से ख़त्म हो गईं। जबकि 16 औरतें गंभीर रूप से जख्मी हो गईं। बहरहाल, पाकिस्तान हो या हिंदुस्तान दोनों मुल्क़ों में करोड़ों लोग ग़ुरबत और भुखमरी से बेहाल हैं, इसलिए हम जैसे बहुत से लोग यह कहते हैं कि दोनों मुल्क़ों की सरकारों को अपने झगड़े निबटाकर जनता की भलाई पर ख़र्च करना चाहिए।
इसी मौक़े पर मुझे कराची का एक बेटा याद आता है, जिसका नाम जमशेद नसरवानजी था, जो बंटवारे से पहले इस शहर को सजाने-संवारने और ग़रीबों के काम आया। अब से दो बरस पहले कराची के कुछ लोगों ने जमशेद नसरवानजी मेहता मेमोरियल के श्रद्धांजलि लेक्चर का सिलसिला शुरू किया है। जमशेद नसरवानजी कराची के पारसी कम्युनिटी के एक बहुत मशहूर शख़्स थे। वे कराची के मेयर भी रहे।
यह मेमोरियल लेक्चर कराची की तरफ़ से उस बेबदल और बेमिसाल शख्सियत को है, जिसने इस शहर के लिए अपनी ज़िंदगी का हर लम्हा ख़र्च कर दिया। 1947 में होने वाले माइग्रेशन ने तीन लाख के कराची को चंद ह़फ्तों के अंदर तीस लाख का शहर बना दिया था। ऐसे में, जब लोगों की पूछताछ करने वाला कोई न था, जमशेद ने उनको आबाद करने के लिए अपनी बिसात से बढ़कर किया। इससे भी बड़ी बात यह है कि वे उन लोगों की अगली नस्लों के बारे में कुढ़ते रहे।
नसरवानजी मेहता के 40 बरस पुराने प्रशंसक केवल मोटवानी ने एक जगह उनके बारे में लिखा है कि उनका सादा ज़ाती फ़लसफ़ा मोहब्बत और दोस्ती की बुनियादों पर क़ायम था और उसका व्यावहारिक इज़हार अपने इर्द-गिर्द के तमाम इंसानों की ख़िदमत से होना था। उनका दान-पुण्य, जात-पांत और मजहब के भेदभाव के बग़ैर सब तक पहुंचता था। हर महीने की पहली तारीख़ को वे कराची में रहने वाले ख़ानदानों के नाम नक़द रुपयों के लिफ़ाफ़े बनाकर भेजते और कराची और हिंदुस्तान के बाहर के ख़ानदानों को मनीआर्डर और चेक के जरिए रक़में भेजते।
जब केवल मोटवानी ने उनके सेक्रेटरी की जिम्मेदारी संभाली, तो उन्होंने इस काम का इंतजाम उनके सुपुर्द कर दिया और उन्हें भी अपनी नेकियों में हिस्सेदार बनाया। हिंदुस्तान और बाहर के संगठनों को दी जाने वाली रक़म ज्यादा बड़ी होती थी। वो लिखते हैं कि 1946 में उनसे आख़िरी बार रुख़सत होते व़क्त मैंने उनकी इस दरियादिली का जिक्र किया था और दी जाने वाली मदद का अंदाज 50 लाख रुपए लगाया, तो जमशेद ने फ़ौरन मुझे टोका और कहा कि दुरुस्त रक़म 40 और 50 लाख के दरमियान है।
मुझे यक़ीन है कि इसके बाद उनकी ज़िंदगी के 6 वर्षो में इस रक़म में कई लाख का इज़ाफा हो गया होगा, लेकिन यह तमाम सख़ावत (दानी प्रवृत्ति) इस क़दर राजदारी से की जाती कि लोगों के दिलों में महफूज़ शुक्र के जज्बे के सिवा जमशेद ने इसका कोई निशान नहीं छोड़ा। जमशेद ने कराची शहर के लिए जिस तरह सुबह-शाम काम किया और इसे जिस मोहब्बत से आबाद किया वो कराची की तारीख़ में हमेशा याद रहेगा।
और अब भास्कर के पढ़ने वालों के ख़त। मनोज पटेल लाहौर के डीलक्स ब्यूटी पार्लर के बारे में जानना चाहते हैं, जहां उन लड़कियों और औरतों के चेहरों की प्लास्टिक सर्जरी होती है, जिनके चेहरे तेजाब से जला दिए जाते हैं। मनोज जी, इस ब्यूटी पार्लर को मिस्बाह चलाती हैं। उन्होंने इटली की एक एनजीओ से मिलकर काम शुरू किया है। दुश्मनी या शादी से इंकार करने पर जिन लड़कियों के चेहरे तेजाब फेंक कर बिगाड़ दिए जाते हैं, उन लड़कियों को इटली भेजा जाता है, वहां के डॉक्टर्स उनके चेहरों को ठीक करने की कोशिश करते हैं, जिसमें वे कामयाब भी होते हैं।