बिल्ली के गले में घंटी बांधने की कहानी सभी ने सुनी है। दरअसल वह कहानी अधूरी है। लंबे समय से इंसान की सैकड़ों पीढ़ियां वही आधी कहानी सुनती आ रही हैं। आज हम आपको पूरी कहानी सुनाएंगे, किंतु पूरी कहानी कहने से पूर्व परंपरागत आधी कहानी दोहराना जरूरी है। वह इस प्रकार है- एक दिन चूहों की संसद का आपातकालीन सत्र आयोजित किया गया। सभी चूहे डरे-सहमे थे। बुजुर्ग चूहों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव रखा कि बिल्ली के गले में घंटी बांध दो। प्रस्ताव सदन में पास हो गया। सवाल उठा कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? चूहों के पुराण में बिल्ली के गले में घंटी बांधन का गुरुमंत्र दर्ज है, किंतु शताब्दियां बीत गईं, कोई चूहा यह कार्य नहीं कर पाया। यह तो बीसवीं सदी के चूहों की बात है। जब 21वीं सदी में यह बात उठी तो बुजुर्ग चूहे, जवान चूहों को बताने लगे कि इस समस्या का हल हमारे ग्रंथों में है, किंतु अब लोग वेद-वाक्यों पर चलते ही नहीं। तब इक्कीसवीं सदी के दो जवान चूहे बोले- घंटी हम बांधेंगे और अगले ही दिन उन्होंने घंटी बांध दी। पूछने पर वे बोले- आपने पुराणों में लिखा पढ़ लिया और हाथ पर हाथ धरकर बैठ गए। बुद्धि के द्वार बंद कर लिए। हम केमिस्ट की दुकान पर गए और नींद की गोलियां ले उड़े। बिल्ली के दूध में उसे मिलाया, जिसे पीकर वह बेहोश हो गई और हमने उसके गले में घंटी बांध दी। आशय यह है कि कभी-कभी ग्रंथों द्वारा सुझाए गए मार्ग से अधिक समीचीन अपनी बुद्धि का प्रयोग होता है। अवसर के अनुकूल तात्कालिक बुद्धि से कार्य करके समस्या का समाधान किया जा सकता है। अत: लकीर के फकीर न बनें।