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गुरु का अभाव था रावण के पतन का कारण
पं. विजयशंकर मेहता Monday, September 28, 2009 00:50 [IST]  

ज्ञानी दुगरुण पाल ले तो वह समाज के लिए बड़ा खतरनाक हो जाता है। रावण के साथ यही हुआ था। परम विद्वान रावण की अनेक बुराइयों की चर्चा वर्षो से साधु-संत कई तरीकों से कर रहे हैं। लंका के रावण का श्रीराम ने वध कर दिया था, लेकिन अरूप रावण आज तक जीवित है। हर वर्ष उसे हम मारते हैं, लेकिन वह फिर-फिर जिंदा हो जाता है।

रावण वध का एक सरल और स्थायी तरीका है कि पहले अपने भीतर के रावण को मारा जाए। रावण के पथभ्रष्ट होने के अनेक कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण था कि उसके पास शास्त्र तो थे पर गुरु नहीं। ज्ञान की अति न सिर्फ अहंकारी बनाती है बल्कि उलझा देती है। गुरु उलझाव से निकलने का उपाय होता है। परंतु रावण जैसे लोग खुद ही अपना उपाय बनने की कोशिश में रहते हैं और इसी के चलते जीवन की सारी व्यवस्था व प्रबंधन बिगाड़ लेते हैं।

रावण किसी को गुरु क्यों नहीं बना पाया? क्योंकि गुरु होता है जीवित व्यक्ति और जीवित व्यक्ति के सामने झुकने में अहंकार को बड़ी चोट लगती है। इसीलिए लोग शास्त्रों या किताबों को गुरु बना लेते हैं क्योंकि इनके साथ सुविधा है। न जमे तो फाड़कर फेंक दो, अहंकार को तृप्ति मिल जाती है। लोग शास्त्रों से ऊबने पर गुरु की खोज शुरू कर देते हैं। तब तक देर हो जाती है। ज्ञान का अहंकार गुरु की कृपा से मुकाबले पर उतर आता है। गुरु एक साक्षात शास्त्र है, जीवित पुस्तक है। परमात्मा से मांग करें कि जीवन में कोई गुरु भेज दें। आपकी मांग में गहराई होगी तो गुरु चलकर आपके द्वार आएंगे और रावण इसी में चूक गया था।

 
 


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