यह महंगाई का रावण है जिसने आम लोगों का जीना दूभर कर रखा है। वह तो भारतीयों की उत्सवधर्मिता की दाद देनी चाहिए कि ऐसी कमरतोड़ महंगाई के बावजूद त्योहारों के प्रति उनके उत्साह में कमी नहीं आई है। पिछले छह माह के दौरान महंगाई का ग्राफ जिस तरह से आसमान पर गया है, वह आम लोगों के लिए न केवल त्रासदीदायक है, बल्कि उन सरकारी आंकड़ों का भी मजाक उड़ाता है जिनके अनुसार मुद्रास्फीति लगातार ऋणात्मक रही है। यही वजह है कि लोग भौंचक नजरों से मुद्रास्फीति के जमीन पर लोटते आंकड़ों को देखते आए हैं, जबकि उनकी चाय लगातार फीकी और दाल पतली होती गई है। महंगाई वाकई में कितनी ज्यादा है, इसका आभास खाद्य पदार्थो के इंडेक्स से लगाया जा सकता है। हाल ही में जारी यह इंडेक्स 15.64 फीसदी पर पहुंच चुका है जो पिछले 11 सालों में उच्चतम स्तर पर है। यही वजह है कि मुद्रास्फीति के नियंत्रण में होने संबंधी दावों के बावजूद महंगाई की आंच आम आदमी को लगातार झुलसा रही है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकार इस दिशा में कर क्या रही है? खबरें बताती हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें अपनी ओर से कोशिशें कर रही हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि इन कोशिशों का असर जमीनी तौर पर तो कहीं नजर नहीं आ रहा है। प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि देश में आर्थिक संकट नहीं है, लेकिन ऐसे दावे क्या उस जनता को राहत प्रदान कर सकते हैं जिसके लिए संकट का मतलब सब्जियों, दाल-चावल के बेकाबू होते दाम हैं। चांद पर पानी ढूंढ़ने की खोज बहुत अहम है, एटमी क्षमता भी देश के लिए मायने रखती है, लेकिन आम जनता को महंगाई से राहत दिलाना एक लोक कल्याणकारी राज्य के लिए इससे भी कहीं ज्यादा अहमियत रखता है। आम जनता को इंतजार उस राम का है जो महंगाई के रावण को धराशायी करके उसके आततायी शासन से मुक्ति दिलाएं। उम्मीद ही की जा सकती है कि हमारा शासन तंत्र भारतीयों की उत्सवधर्मिता की और परीक्षा न लेकर ऐसे ठोस कदम उठाएगा कि आने वाली दिवाली वास्तव में हर आम-खास के लिए आनंददायक बन सके।
आज सारा देश विजयादशमी का पर्व मना रहा है। जगह-जगह बुराई के प्रतीक रावण के पुतलों का दहन किया जाएगा, लेकिन इसके बावजूद एक रावण अब भी पीछा नहीं छोड़ेगा, जिसका कद पिछले कुछ महीनों से लगातार बढ़ता गया है।